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महंगाई से 'आईएएस फैक्ट्री' पर आई आफत

Thu, 24 Oct 2013 11:50 AM IST
अविनाशी श्रीवास्तव/अमर उजाला, इलाहाबाद
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लगातार बढ़ती महंगाई ‘आईएएस फैक्ट्री’ के सपनों पर चोट करने लगी है। खाने पीने की चीजों की कीमतें आसमान पर हैं और महंगाई की मार के कारण प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुटे छात्रों का मनोबल जमीन पर।
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सुबह की चाय से लेकर रात का भोजन, कमरे का किराया, किताब-कापियां तक महंगी। नतीजा है कि प्रतियोगी छात्र भाग रहे हैं या फिर परेशानी में समय काट रहे हैं।

महंगाई का आलम यह है कि दो वर्ष पहले तक जो टिफिन 20 रुपये में मिल जाता था अब 30 रुपये से कम में संभव नहीं है। मकान का किराया भी डेढ़ गुना तक बढ़ गया है। इसके अलावा कोचिंग की फीस बढ़ी। तकरीबन सभी भर्तियों के परीक्षा प्रारूप में बदलाव हो गया है, इसकी वजह से कोचिंग की जरूरत ज्यादा है।

प्रतियोगियों का कहना है कि पहले महीने में दो हजार रुपये में खर्च चल जाता था लेकिन अब तीन हजार रुपये भी कम पड़ रहे हैं, वह भी तब जब एक छोटे से कमरे में तीन-चार लोग रह रहे हैं।
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ऊंचवागढ़ी में रहने वाले दीपक जौहरी ने बताया कि 2005 में उनके भाई ने इसी मोहल्ले में 500 रुपये प्रति महीने किराये पर कमरा लिया था। तीन साल पहले दीपक ने बगल के मकान में 1500 रुपये में कमरा लिया लेकिन अब उसी के ढाई हजार रुपये देने पड़ रहे हैं। अकेले वहन नहीं कर पा रहे इसलिए एक सहयोगी भी रखा है।

बघाड़ा में रहकर तैयारी करने वाले भोला का कहना है कि उन्हें यहां आए दो साल हुआ है। तब दोनों वक्त की टिफिन के लिए जो देने पड़ते थे, अब डेढ़ गुना हो गया।

ऊंचवागढ़ी में टिफिन पहुंचाने वाले रामजी गुप्ता का कहना है कि कीमत बढ़ाना उनकी मजबूरी है। टिफिन तैयार करने वाले अच्छे यादव का कहना है कि बच्चे घर छोड़कर यहां पढ़ने आते हैं। उनकी पूरी कोशिश होती है कि खाना पोषण से युक्त हो लेकिन रोज चीजें महंगी हो रही हैं, ऐसे में कीमतें बढ़ाना मजबूरी है।

चयन में देरी पड़ रही भारी
इस महंगाई में प्रतियोगी परीक्षाओं के रिजल्ट में देरी भी प्रतियोगियों पर काफी भारी पड़ रही है। पांच साल पहले शुरू हुईं भर्ती परीक्षाओं का रिजल्ट भी अभी लंबित है। लोअर सबऑर्डिनेट 2008, 2009 भर्ती परीक्षाओं के रिजल्ट अभी नहीं घोषित हुए हैं।

पीसीएस 2011 का इंटरव्यू अभी होना है तो 2012 मुख्य परीक्षा तथा 2013 के प्रारंभिक परीक्षा के रिजल्ट का अभी इंतजार है। उच्चतर शिक्षा सेवा चयन आयोग में तो चार साल से कोई भर्ती नहीं हुई हैं। दो भर्तियों के लाखों आवेदकों का भविष्य वहां बंडलों में बंद है।

प्राथमिक तथा माध्यमिक विद्यालयों के भी 80 हजार से अधिक पदों पर वर्षों से भर्ती लंबित है। इसकी वजह से अनिश्चितता का माहौल बन गया है तथा प्रतियोगियों को एक ही भर्ती प्रक्रिया में तीन से चार साल बेवजह गुजारना पड़ा रहा है।

पैकअप की तैयारी
महंगाई तथा भर्ती प्रक्रिया पूरी होने में देरी के कारण बड़ी संख्या में प्रतियोगी एक-दो परीक्षा के बाद ही पैकअप के लिए मजबूर हैं। मम्फोर्डगंज के आशीष और आनंद का कहना है कि उन्होंने कोचिंग पूरी कर ली है। अब घर से पैसा मिलना मुश्किल हो गया है। घर से दबाव भी बढ़ने लगा है। इसकी वजह से अब गाजीपुर स्थित गांव में रहकर ही तैयारी करेंगे।
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