काले कारोबार के मास्टरमाइंड नवीन ने पुलिस और अन्य विभागों की पकड़ से बचने का ऐसा नेटवर्क और तरीका अपनाया जिसे जानकार खाकी हैरान है। सिक्कों के जखीरे को दिल्ली तक पहुंचाने के तरीके ने पुलिस के साथ ही एआरटीओ और जीएसटी विभाग के भी होश उड़ा दिए। नवीन सिक्कों को लग्जरी कार में रखकर दिल्ली ले जाता था। पारिवारिक यात्रा दर्शाने के लिए वह कार में आगे पीछे महिलाओं और बच्चों को बिठाता था। फैमिली ट्रिप का दिखावा कर वह पकड़ में आने से बचा रहता था।
हाथरस से दिल्ली तक हाईवे पर पुलिस, एआरटीओ और जीएसटी विभाग की पैनी नजर रहती है। मालवाहक गाड़ियां तुरंत चेकिंग की गिरफ्त में आ जाती हैं। इस शिकंजे से बचने के लिए निजी लग्जरी कारों का इस्तेमाल किया गया। चेकिंग से बचने के लिए कार की अगली-पिछली सीटों पर महिलाओं और छोटे बच्चों को बिठाया जाता था। बाहर से देखने वाले को लगता कि कोई परिवार छुट्टियां मनाने या रिश्तेदारी में जा रहा है जबकि उसी कार की डिग्गी और सीटों के नीचे लाखों रुपये के सिक्के होते थे। पैसे देकर महिलाओं को बच्चों समेत बुलाया जाता था। सिक्कों का वजन इतना भारी होता है कि सामान्य बोरे-बोरियां झटके से फट जाते हैं। इससे बचने के लिए सिक्कों को बेहद मजबूत जूट (पटसन) की बोरियों में भरा जाता था। बोरियों को इस कदर सिला और कसा जाता था कि हाईवे के भारी से भारी झटकों में भी एक सिक्का तक बाहर न गिरे। गोपनीय ठिकानों पर इन बोरियों की लोडिंग की जाती थी।
निजी कारों और मासूम चेहरों का इस्तेमाल कर पुलिस को चकमा देने वाला यह नेटवर्क अब पूरी तरह रडार पर है। पुलिस अब इस बात की तहकीकात में जुटी है कि सफर में शामिल की जाने वाली महिलाएं और लोग इस काले कारोबार का हिस्सा थे या महज इस्तेमाल किए गए मोहरे। साफ है कि हाथरस का यह सिक्का-कांड सिर्फ अवैध कमाई का जरिया नहीं बल्कि सिस्टम को सीधी चुनौती देने वाला एक सुनियोजित अपराध था। (संवाद)
मेटल के लालच में भट्टी में झोंके जा रहे सिक्के
हाथरस। जिले में 1 से 10 रुपये के सिक्कों की कालाबाजारी करने वाले देश की मुद्रा को भट्टियों में खपा रहे हैं। मुनाफाखोर सिक्कों को गलाकर आर्टिफिशियल ज्वेलरी और ब्लेड जैसी वस्तुएं तैयार कर रहे हैं जिससे उन्हें सिक्कों के वास्तविक अंकित मूल्य से कई गुना अधिक मुनाफा मिल रहा है। नवीन कुमार स्टेशनरी की दुकान की आड़ में पिछले 10 सालों से यह अवैध कारोबार कर रहा था। काम बढ़ने के कारण उसके दो साले भी इस धंधे में उतर आए थे। बाजार से ये लोग रेजगारी एकत्रित करते थे। 100 रुपये की रेजगारी 85 रुपये में ली जाती थी। इसे नवीन आगे 100 से 105 रुपये में बेचता था। 15 से 20 फीसदी कमीशन में ही इनके करोड़पति बनने की चर्चाएं हैं। जानकारी के अनुसार दिल्ली के खारी बावली से आर्टिफिशियल ज्वैलरी, ब्लेड आदि बनाने के लिए संबंधित कारोबारी सिक्के खरीद कर ले जाते हैं। जिले में ढकपुरा रोड पर कुछ भट्टियां संचालित हैं जहां मेटल का काम होता है। आशंका जताई जा रही है कि इसी आड़ में सिक्कों को गलाने का अवैध खेल चल रहा है। एलडीएम और पुलिस प्रशासन दोनों इस दिशा में तकनीकी जांच करा रहे हैं। हालांकि प्रशासनिक अधिकारियों ने अभी इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है।
पुलिस-प्रशासन में नहीं दिखा समन्वय
हाथरस। जिले में भारतीय मुद्रा की अवैध कालाबाजारी का पर्दाफाश होने के बाद प्रशासन और पुलिस की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े हो गए हैं। बड़ी मात्रा में सिक्के बरामद होने के बाद भी अधिकारी एक-दूसरे पर कार्रवाई की बात टालते नजर आए। एफआईआर के लिए देर रात तक कोतवाली सदर में तहरीर नहीं पहुंची। इस खुलासे ने बाजार में हलचल पैदा कर दी है। इस कारोबार से जुड़े कई लोगों के अंडरग्राउंड होने की खबर है। इधर अधिकारी भले ही पल्ला झाड़ते दिखे लेकिन सूत्रों ने बताया कि मामले में आईबी और एलआईयू सक्रिय हो गई हैं।
देश में सिक्कों की कालाबाजारी, अवैध तस्करी और उनके धातु मूल्य के अवैध व्यापार पर राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई), केंद्रीय आर्थिक खुफिया ब्यूरो (सीईआईबी) और राज्य पुलिस की खुफिया शाखाएं पहले से ही पैनी नजर रखती हैं। इसके बावजूद, स्थानीय स्तर पर इतने लंबे समय तक यह अवैध कारोबार चलना सुरक्षा व्यवस्था और खुफिया तंत्र की बड़ी चूक को दर्शाता है।
बैंकों की भूमिका पर भी सवाल
इस मामले में अब बैंकिंग प्रणाली भी सवालों के घेरे में आ गई है। छापे के दौरान गोदाम से बरामद बोरियों में 100-100 सिक्कों के चमचमाते पॉली पैक मिले हैं जो सीधे बैंक या करेंसी चेस्ट से जारी होने की ओर साफ इशारा कर रहे हैं। इससे आशंका जताई जा रही है कि बैंक कर्मचारियों या बिचौलियों की मिलीभगत से ये सिक्के सीधे कालाबाजारी करने वालों के गोदाम तक पहुंचाए जा रहे थे।
कचरी-नमकीन कारोबारियों से जुड़े हैं तार
हाथरस कचरी, पोला और नमकीन के निर्माण का बड़ा केंद्र है। यहां से तैयार माल उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के अलावा अन्य पड़ोसी राज्यों में भी सप्लाई होता है। चूंकि इन उत्पादों की रिटेल बिक्री पांच और 10 रुपये के सिक्कों में ज्यादा होती है इसलिए बाहर के व्यापारी हाथरस के उद्यमियों को भुगतान में सिक्कों की बड़ी खेप थमा देते हैं। इन सिक्कों को बैंकों में जमा न करा पाने की मजबूरी का फायदा उठाकर कालाबाजारी करने वाले गिरोह सक्रिय हो जाते हैं और तौल के हिसाब से या कमीशन काटकर सिक्कों को इकट्ठा कर लेते हैं।
हर माह करेंसी मैनेजमेंट की बैठक होती है और करेंसी चेस्ट को सीधे तौर पर आरबीआई मॉनीटर करता है। इसलिए वहां से किसी प्रकार की गड़बड़ी संभव नहीं है। सिक्कों व करेंसी की आपूर्ति के लिए डिमांड भेजी जाती है और कभी आरबीआई अपनी मर्जी से भी भेजता है। सिक्कों के लेन-देन की कोई सीमा तय नहीं है, उपभोक्ता जितने चाहें सिक्के जमा कर सकते हैं और बैंक में मौजूद स्टॉक के आधार पर ले भी सकते हैं। 100-100 सिक्कों की नई पैकिंग मिलने के मामले में यह आशंका भी खारिज नहीं की जा सकती कि कहीं ये नकली सिक्के तो नहीं बनाए जा रहे। इस बिंदु पर भी गहन जांच की आवश्यकता है। राजीव कुमार, अग्रणी जिला प्रबंधक, हाथरस।
ऊपर मकान, नीचे गोदाम, दुकान से काला कारोबार
हाथरस। सिक्कों के काले कारोबार की जांच में सामने आया है कि यह नेटवर्क शातिराना तरीके से छोटी-छोटी जगहों से संचालित किया जा रहा था। आरोपी नवीन ने नयागंज स्थित महज आठ फुट चौड़ाई की एक छोटी सी दुकान को अपना ठिकाना बना रखा था। इस दुकान में मुख्य रूप से धार्मिक पुस्तकें, कैलेंडर, कॉपी और डायरियों का कारोबार दिखाया जाता था। दुकान पर आने वाले खास ग्राहकों और दलालों से यहीं पर सौदे तय किए जाते थे। हनुमान गली स्थित मकान के निचले हिस्से में सिक्कों के भंडारण के लिए गोदाम बना रखा था। घनी आबादी और संकरी गलियों वाले इलाके में इतने बड़े पैमाने पर सिक्कों के जमावड़े की खबर फैलते ही आसपास के लोग भी सन्न रह गए। सिक्कों की कालाबाजारी पकड़े जाने पर खबर आग की तरह पूरे शहर में फैल गई। इस दौरान दुकान के नौकरों ने शटर गिरा कर दुकान बंद कर दी। वहीं घर व गोदाम पर भीड़ जुट गई। मोहल्ले के लोगों के अलावा अन्य जगहों से लोग चलते-फिरते कार्रवाई के बारे में जानकारी करते रहे। हनुमान गली से बरामद सिक्कों के बोरों को कोतवाली तक पहुंचाने के लिए पुलिस को मेटाडोर बुलानी पड़ी। करीब 60 किलो वजन के सिक्कों के बोरों को मेटाडोर में लादने के लिए पांच मजदूरों को भी बुलाना पड़ा।