हसायन कस्बे व देहात क्षेत्र में छोटे-बड़े मिला कर इत्र के करीब 150 कारखाने संचालित हो रहे है। हरेक कारखाने में 30 से 35 मजदूर गुलाब के फूल से अर्क निकाल कर इत्र तैयार करते है। इन दिनों इस कारोबार का सबसे बड़ा सीजन चल रहा है। इन्हीं कारखानों के मालिक स्थानीय किसानों से गुलाब खरीदते हैं।
चिलर प्लांट की मांग
साल की पहली फसल फरवरी, मार्च और अप्रैल के महीनों में होती है। दूसरी फसल जुलाई, अगस्त और सितंबर में होती है। लगभग 300 किसान 1500 से 2000 बीघा में इसकी पैदावार करते हैं। किसान कई वर्षों से इस क्षेत्र में एक चिलर प्लांट स्थापित करने की मांग कर रहे हैं ताकि गुलाब को कुछ दिनों तक सहेज कर रखा जा सके और उन्हें उचित मूल्य मिल सके, लेकिन अब तक इसकी स्थापना नहीं हो सकी है। बता दें कि इसके लिए किसान कई बार धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं, लेकिन आज तक उनकी सुनवाई नहीं हुई है।
एक बीघा फसल की लागत 14,000 से 15,000 रुपये तक आती है। एक सीजन में एक बीघा खेत से लगभग 3.20 क्विंटल फूल पैदा होता है। जिसकी कीमत इन दिनों लगभग 28,000 रुपये हो रही है। ऐसे में लागत निकालने के बाद किसान को लगभग 13000 रुपये तक बच रहे हैं। जिससे उनका गुजारा मुश्किल से हो रहा है। 90 दिनों की मेहनत के बाद उन्हें सिर्फ 13000 रुपये ही बच पा रहे हैं।
इत्र, गुलकंद और गुलाब जल में होता है प्रयोग
हसायन का गुलाब कन्नौज, अजमेर, बनारस और मुंबई तक के कारोबारियों के पास पहुंचता है। जहां इसका प्रयोग इत्र, गुलकंद, गुलाब जल, गुलबारी और सौंदर्य प्रसाधन के उत्पादों में किया जाता है। हसायन का अधिकांश गुलाब कन्नौज के व्यापारियों द्वारा खरीदा जाता है। जिससे बड़ी मात्रा में इत्र बनाया जाता है।