समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल के बीच बढ़ रहीं गठबंधन की पींगों ने फिलहाल जिले के सियासी खेमों की उत्सुकता बढ़ा रखी है। यह तीनों पार्टियां ही नहीं, बल्कि इनके विरोधी भी इस गठबंधन की तस्वीर साफ होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
अगर यह गठबंधन हुआ तो निश्चित रूप से जिले की राजनीति में नामांकन से पहले बदलाव देखने को मिल सकता है। सबसे ज्यादा चिंता उन सपा प्रत्याशियों को है, जिनकी घोषणा पहले ही हो चुकी है, लेकिन गठबंधन की हलचल के बीच वह अपने चुनावी रथ को आंगे नहीं हांक पा रहे। उन्हें डर है कि अगर गठबंधन हो गया तो उनके सियासी भविष्य पर संकट के बादल मंडरा सकते हैं।
सपा अखिलेश, कांग्रेस एवं रालोद के महा गठबंधन की सरगर्मियां जिस तेजी से बढ़ रही हैं। स्थानीय नेताओं के भविष्य पर संगठन के बादल मंडरा रहे हैं, क्योंकि यह गठबंधन जिले की तीनों विधानसभाओं की तस्वीर बदल सकता है।
इस स्थिति पर स्थानीय नेताओं की भी टकटकी लगी हुई हैं, क्योंकि इस गठबंधन के कारण कई नेताओं का राजनीतिक भविष्य भी मुश्किल में फंस सकता है तो कुछ की लॉटरी लग सकती है।जिस तरह दिल्ली-लखनऊ से तीनों पार्टियों के बीच डील पक्की होने की खबरें आ रही हैं, उससे खासकर सत्ता पक्ष के प्रत्याशियों की धड़कनें बढ़ रही हैं।
गठबंधन के बाद उन्हें यह तय करना होगा कि वह अखिलेश यादव के खेमे में रहेंगे या फिर सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के खेमे से किस्मत आजमाएंगे। यह भी सवाल तीनाें ही पार्टियों के नेताओं के जेहन में कौंध रहा है कि आखिर गठबंधन के बाद जिले की तीनों में से कौन सी सीट किस पार्टी के खाते में जाएगी और उनकी जगह सत्ता पक्ष के प्रत्याशियों का क्या होगा।
सत्ता पक्ष के प्रत्याशी तो फिलहाल यही दुआ कर रहे होंगे कि किसी भी तरह यह गठबंधन टल जाए, ताकि उन्हें अखिलेश के नेतृत्व में चुनाव लड़ने का फायदा मिल जाए। गठबंधन के बाद संभावित विकल्पों पर भी तेजी से मंथन चल रहा है। उम्मीद है कि अगले 24 घंटों के भीतर सूबे के इस सबसे बड़े गठबंधन की तस्वीर एकदम साफ हो जाएगी।