समाजवादी एंबुलेंस सेवा अब दम तोड़ती नजर आ रही है। पहले जहां एंबुलेंस 108 समय पर पहुंचकर मरीजों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाती थी। वहीं अब कई घंटे तक मरीजों को एंबुलेंस की राह देखनी पड़ती है, जिससे मरीज की जिंदगी खतरे में पड़ जाती है।
रविवार को चंदपा क्षेत्र के गांव ककोड़ी की रहने वाली एक प्रसूता को प्रसव पीड़ा होने पर परिजनों ने एंबुलेंस 108 को फोन किया तो कई घंटे के इंतजार के बाद भी एंबुलेंस गांव में नहीं पहुंची। हारकर, परिजनों ने गांव में किसी की कार मांगी और वह प्रसूता को महिला अस्पताल लेकर पहुंचे। नतीजा, रास्ते में ही प्रसूता ने बच्चे को जन्म दे दिया। महिला अस्पताल के गेट पर इमरजेंसी स्टाफ ने जरूरी उपचार दिया।
ककोड़ी की रहने वाली 22 साल की पूनम की हालत अस्पताल तक आते-आते काफी बिगड़ गई थी। कई घंटे तक इमरजेंसी में उपचार मिलने के बाद वह सामान्य हुईं। उनके पति मुकेश ने बताया कि सुबह आठ बजे से उनकी पत्नी को प्रसव पीड़ा हो रही है। तभी एंबुलेंस 108 को फोन किया गया था। एंबुलेंस नहीं पहुंची। कई बार फोन करने पर भी एंबुलेंस नहीं आई।
उल्टा एंबुलेंस संचालक ने प्रसूता और परिजनों को गांव से लाड़पुर तक अपने साधन से पहुंचने की शर्त रख दी। एंबुलेंस के नहीं पहुंचने के कारण मुकेश आठ सौ रुपये खर्च कर पूनम को दोपहर 12 बजे तक महिला अस्पताल ला सके, जबकि उनका प्रसव रास्ते में हो गया।
हसायन की एक महिला को भी रविवार सुबह प्रसव पीड़ा हुई थी। परिजनों ने पहले एंबुलेंस 102 को बुलाया। एक घंटे बाद एंबुलेंस पहुंची और गुड्डी देवी को मथुरापुर से हसायन सीएचसी तक ले गई। उसके बाद हसायन सीएचसी पर भी हालत नाजुक देखते हुए महिला अस्पताल ले जाने को कहा। यहां एंबुलेंस 108 को फोन किया। एंबुलेंस नहीं आई। देर तक फोन करने पर एक घंटे बाद एंबुलेंस पहुंची। जब एंबुलेंस गुड्डी देवी को महिला अस्पताल लेकर पहुंची तो वह गेट पर उतरते ही बैठ गईं। उनकी हालत वहीं बिगड़ गई।
एंबुलेंस के पास ही प्रसव की तैयारी होने लगी। इमरजेंसी स्टाफ बाहर आ गया। गुड्डी देवी को अंदर ले जाने के लिए स्ट्रेचर मंगाया गया, लेकिन स्ट्रेचर खराब पड़ा था। बीते दिनों एक एंबुलेंस ने स्ट्रेचर को टक्क र मार दी थी। हालत बिगड़ने पर उन्हें किसी तरह व्हील चेयर पर इमरजेंसी के अंदर ले जाया गया।
महिला अस्पताल की इमरजेंसी बेहाल है। पूनम को जब मुकेश इमरजेंसी लेकर पहुंचे तो वहां कोई डॉक्टर नहीं थी। ड्यूटी के हिसाब से जिस डॉक्टर को सुबह साढ़े आठ बजे अस्पताल में होना चाहिए था वह दोपहर 12 बजे तक अलीगढ़ से नहीं आ सकी थीं। इमरजेंसी की नर्स और बाकी स्टाफ ने पूनम का उपचार किया।
महिला अस्पताल से सीएमओ का कोई लेना-देना नहीं है। वहां सीएमएस हैं, जो पूरे अस्पताल की सेवाओं के लिए जिम्मेदार हैं। सीएमएस सीएमओ के अधीन नहीं होते और न ही हम अस्पताल के कामकाज में हस्तक्षेप कर सकते हैं।
- डॉ. रामवीर सिंह, सीएमओ हाथरस