दुर्लभ फसलों का अनोखा संगम
फार्म पर चार प्रकार के गेहूं उगाए जा रहे हैं, जिनमें काला गेहूं और करीब 2000 वर्ष पुरानी ‘सोना मोती’ प्रजाति शामिल है। इसके अलावा शरबती गेहूं, पीली सरसों, दो किस्म की हल्दी और औषधीय गुणों से भरपूर काला नमक चावल की खेती भी की जा रही है। फल उत्पादन में अमरूद, मौसमी और अनार भी पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से उगाए जा रहे हैं।
कुफरी नीलकंठ बना खास पहचान
इन दिनों इस फार्म का सबसे बड़ा आकर्षण ‘कुफरी नीलकंठ’ आलू है, जिसे औषधीय गुणों के कारण विशेष माना जा रहा है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह आलू सामान्य आलू की तुलना में अधिक लाभकारी है। इसमें एंथोसायनिन और कैरोटीनॉयड जैसे एंटीऑक्सीडेंट प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर के विषैले तत्वों को बाहर निकालने में मदद करते हैं और हृदय रोगों से बचाव करते हैं। कम वसा और अधिक पोटेशियम होने के कारण यह दिल के मरीजों के लिए फायदेमंद है। वहीं, कम स्टार्च होने से सीमित मात्रा में यह मधुमेह रोगियों के लिए भी बेहतर विकल्प माना जाता है।
बाजार और समर्थन की कमी बनी चुनौती
मदन मोहन रावत का कहना है कि प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा देने के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर हालात अलग हैं। न तो कोई विशेष बाजार उपलब्ध है और न ही आर्थिक प्रोत्साहन या अनुदान मिल पा रहा है। उचित मूल्य और विपणन की कमी के कारण जैविक उत्पाद उगाने वाले किसानों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है