बायो मेडिकल वेस्ट उठाने के लिए पहले लखनऊ स्तर से टेंडर उठता था। इस बार अप्रैल 2025 में सीएमओ स्तर से टेंडर निकाला गया था। जुलाई में मथुरा की कंपनी बायो मेडिकल वेस्ट डिस्पोजल एजेंसी (बीएमडब्ल्यूडीए) को टेंडर मिला। तब से यही कंपनी सरकारी व प्राइवेट अस्पतालों से निकलने वाले चिकित्सा कचरे का निस्तारण करा रही है। इसी कंपनी की तरफ से अस्पतालों को मेडिकल वेस्ट प्रबंधन का सर्टिफिकेट मिलता है। अस्पताल का पंजीयन कराने और पंजीयन नवीनीकरण में यह सर्टिफिकेट खासा अहम होता है।
80 संस्थाओं ने ही लिया सर्टिफिकेट, 107 ने नहीं किया प्रबंध
जिले में 137 पंजीकृत निजी अस्पताल हैं। इनके अलावा 35 आयुर्वेदिक क्लीनिक, 26 सामान्य क्लीनिक तथा लगभग 75 पैथोलॉजी लैब हैं। इन सभी से निकलने वाले कचरे को उठाने की जिम्मेदारी मथुरा की कंपनी की है। कंपनी के मैनेजर मोहन गर्ग ने बताया कि पिछले चार महीनों में केवल 80 इकाइयों ने ही उनसे मेडिकल वेस्ट प्रबंधन के सर्टिफिकेट प्राप्त किए हैं। इनमें 30 प्राइवेट अस्पताल हैं और शेष पैथोलॉजी व क्लीनिक हैं। सादाबाद, शहर में बाईपास व मथुरा रोड, सासनी व सिकंदराराऊ के अस्पताल भी इनमें शामिल है। शहर सहित जिले के 107 प्राइवेट अस्पतालों ने अभी तक सर्टिफिकेट प्राप्त नहीं किए हैं, जिससे उनके यहां से कूड़ा नहीं उठाया जा रहा है।
रोजाना करीब 220 किलो निकल रहा कचरा
शहर की 190 इकाइयों से इस वक्त हर महीने लगभग 6.6 टन मेडिकल वेस्ट कूड़े में फेंका जा रहा है। प्राइवेट अस्पताल सहित अन्य संस्थाएं इसमें शामिल हैं। इन इकाइयों से रोजाना लगभग 220 किलो कचरा निकल रहा है, जो सामान्य कूड़े में मिलकर संक्रमण फैला रहा है। इस हिसाब से महीने में 6.6 टन मेडिकल वेस्ट कूड़े के ढेर व नालों में फेंका जा रहा है। 80 इकाइयों से फिलहाल एजेंसी रोजाना 100 किलो चिकित्सा कचरा उठा रही हैं।
यह होता है मेडिकल वेस्ट
चिकित्सा कचरे में सुइयां, सिरिंज, स्केलपेल ब्लेड, रक्त के अवशेष, शरीर के तरल पदार्थ से दूषित वस्तुएं, गंदी रूई, ड्रेसिंग, गंदे प्लास्टर कास्ट, बिस्तर, शरीर से दूषित अन्य सामग्री शामिल होती है। अस्पतालों में प्रति बेड व क्लीनिक में मरीजों की संख्या के आधार पर चिकित्सा कचरे का निर्धारण है। इसी आधार पर एजेंसी सर्टिफिकेट की फीस तय करती है।