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World Laughter Day: मोबाइल स्क्रीन में खो गए ठहाके, रील में फंसे परिवार, एक छत के नीचे हुए अजनबी

Sun, 03 May 2026 02:46 AM IST
Chaman Kumar Sharma अमर उजाला नेटवर्क, हाथरस

सार

हर माह डिप्रेशन के शिकार 50 से 60 मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं। इसका कारण बढ़ता स्क्रीन टाइम व अकेलापन है। मोबाइल और इंटरनेट रिश्तों के बीच की दीवार बन गए हैं।
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मोबाइल पर अकेले रील देखती बच्ची - फोटो : अमर उजाला डिजिटल
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विस्तार
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हाथरस शहर की गलियां अब भी वैसी ही हैं, लेकिन इनमें खेलते बच्चों का शोर व घरों का माहौल बदल गया है। कभी जिन घरों के आंगन ठहाकों से गूंजते थे, वहां अब सन्नाटा पसरा रहता है। एक ऐसा सन्नाटा, जिसमें केवल नोटिफिकेशन की टिंग-टिंग और टीवी पर होने वाली चिल्लाहट सुनाई देती है। हाथरस ही नहीं, बल्कि हर शहर की यही कहानी है। तकनीक ने हमसे हमारी साझा हंसी छीन ली है।

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केस- 1
डाइनिंग टेबल अब एक फर्नीचर

शहर के सादाबाद गेट इलाके में रहने वाले अग्रवाल परिवार में छह सदस्य हैं। परिवार के मुखिया बताते हैं कि 25 साल पहले तक वे संयुक्त परिवार में रहते थे, चारों भाई साथ थे। तब मोबाइल, यूट्यूब व रील का दौर भी नहीं था। घर में रात का खाना एक उत्सव जैसा होता था। माता-पिताजी बच्चों को अपने किस्से व कहानियां सुनाते थे। बातचीत में ही देर रात हो जाती थी। बिना नींद थकान उतर जाती थी। अब परिस्थितियां अलग हैं। सभी भाइयों के घर अलग-अलग हैं। माता-पिता साथ हैं। बच्चे बड़े हो चुके हैं। उनकी अलग दुनिया है। सब पर अपने-अपने मोबाइल हैं। तीनों कमरों में टीवी हैं। हम सभी एक घर में एक वाईफाई से जरूर जुड़े हैं, लेकिन साथ होकर भी साथ नहीं। खाना भी अपने-अपने कमरों में टीवी व मोबाइल के आगे खाया जाता है। रसोई के पास पड़ी डाइनिंग टेबल बस एक फर्नीचर है, यहां परिवार नहीं मिलता।

केस-2
सोशल मीडिया पर हैप्पी फैमिली, असल में अजनबी

जिला अस्पताल के मानसिक रोग विभाग में डिप्रेशन की शिकार एक ऐसी महिला पहुंची, जिसने आज के परिवारों की वास्तविक स्थिति उजागर कर दी। भरा-पूरा परिवार व आर्थिक रूप से संपन्न होने के बाद भी यह महिला डिप्रेशन में थी। क्लीनिकल साइक्लॉजिस्ट डाॅ. ललित कुमार ने बताया कि जब काउंसिलिंग की गई तो पता चला कि महिला अकेलेपन से परेशान थीं। उनके फेसबुक और इंस्टाग्राम पर फैमिली डिनर व कार्यक्रम की तस्वीरें खूब लाइक बटोर रही थीं, लेकिन वास्तविक खुशी दूर-दूर तक नहीं थी।
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काउंसिलिंग में परिवार के बीच डिजिटल दूरी देखने को मिली। घर में पांच सदस्य हैं और सभी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त रहते हैं। पति काम से लौटते हैं तो टीवी और फिर मोबाइल में लग जाते हैं। सास अपनी टीवी में और बच्चे अपने कमरे में ईयर फोन लगाकर गेमिंग में व्यस्त रहते हैं। खुद महिला भी अपने सोशल मीडिया पर व्यस्त रहती हैं। कब डिप्रेशन में पहुंच गई पता नहीं चला।

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आगरा रोड पर पॉलिटेक्निक के पार्क में खिलखिला कर हंसते बुजुर्ग - फोटो : संवाद
डिजिटल डिटॉक्स की जरूरत
क्लिीनिकल साइक्लॉजिस्ट डाॅ. ललित कुमार ने बताया कि हर माह डिप्रेशन के शिकार 50 से 60 मरीज अस्पताल पहुंच रहे हैं। इसका कारण बढ़ता स्क्रीन टाइम व अकेलापन है। मोबाइल और इंटरनेट रिश्तों के बीच की दीवार बन गए हैं। अब डिजिटल डिटॉक्स होने की आवश्यकता है। हर शाम परिवार के लोग साथ बैठें, टीवी और मोबाइल को स्विच ऑफ कर बातें करें। इससे खोई हुई हंसी वापस आएगी।

क्या खो दिया
  • दादी के चुटकुले और किस्से : इंटरनेट के दौर में बुजुर्गों का अनुभव और उनके किस्से आज की पीढ़ी को बोरिंग लगने लगे हैं।
  • बच्चों की शरारत : अब बच्चे बाहर मैदान में पसीना बहाने के बजाये स्क्रीन पर वर्चुअल दुनिया में सक्रिय हैं। वास्तविक जीवन से दूर हो रहे हैं।
  • संवाद की कमी : पहले दिनभर की थकान परिवार के साथ बातचीत व डिनर से दूर होती थी। अब लोग रील देखकर खुद को एंटरटेन तो कर रहे हैं, पर मानसिक सुकून गायब है।
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