ठेका व्यवस्था में शोषण
औद्योगिक इकाइयों में बड़ी संख्या में श्रमिक ठेका व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं। गैर-पंजीकृत ठेकेदारों के माध्यम से काम पर लगाए गए ये श्रमिक 300 से 500 रुपये प्रतिदिन की मजदूरी पर काम करने को मजबूर हैं। न तो उनके काम के घंटे तय हैं और न ही किसी प्रकार की सुरक्षा गारंटी।
फैक्टरियों में सीमित लाभ
कारखाना एक्ट के तहत जिले में करीब 270 फैक्टरियां पंजीकृत हैं, लेकिन प्रत्येक में औसतन केवल 10 श्रमिकों को ही पीएफ, ईएसआई व अन्य सुविधाएं मिल पाती हैं। शेष श्रमिक ठेका या असंगठित रूप में काम करते हैं, जिन्हें इन सुविधाओं से वंचित रखा जाता है।
एप आधारित श्रमिक भी परेशान
नई अर्थव्यवस्था में एप आधारित कार्यों में लगे डिलीवरी बॉय और अन्य गिग वर्कर की स्थिति भी बेहतर नहीं है। बड़ी-बड़ी कंपनियों के लिए काम करने के बावजूद इन्हें न तो किसी प्रकार का फंड मिलता है और न ही बीमा या अवकाश। इनका भुगतान पूरी तरह डिलीवरी की संख्या पर आधारित होता है, जिससे आय भी अस्थिर रहती है। दुर्घटना या बीमारी की स्थिति में कोई सुरक्षा कवच नहीं होता।
मजदूरों की हकीकत
- एक फैक्टरी में औसतन 10 श्रमिक, बाकी ठेका प्रथा में
- सामाजिक सुरक्षा पाने वाले कुल श्रमिकों की संख्या 2900
- दिहाड़ी मजदूरी : 300 से 500 रुपये प्रतिदिन तक
- छुट्टी का पैसा कट रहा, दिहाड़ी में होता है भुगतान
- डिलीवरी बॉय भी बीमा, फंड व अवकाश से वंचित
- ठेका श्रमिकों को नहीं मिलती सामाजिक सुरक्षा
- कारखाना एक्ट में 270 फैक्टरियां, 110 कोल्ड स्टोर