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यह कैसा कारगिल विजय दिवस... श्रद्धांजलि देने न नेता पहुंचे और न अफसर

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शहीद गजपाल का स्मारक। - फोटो : SADABAD
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संवाद न्यूज एजेंसी, सादाबाद।
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कारगिल युद्ध को 21 साल पूरे हो गए। साल 1999 में 26 जुलाई का वही दिन था, जब भारतीय जवानों ने पाकिस्तानी सैनिकों को खदेड़ते हुए कारगिल की पहाड़ियों पर तिरंगा लहराया था। हमारे जवानों ने अद्म्य साहस का परिचय दिया और जांबाजी से युद्ध लड़ते हुए दुश्मन को भागने पर मजबूर कर दिया। मुश्किलें बहुत थीं, लेकिन हमारे जवान डटे रहे। कारगिल की ऊंची पहाडिय़ों पर करीब 60 दिनों तक चले युद्ध में भारतीय सेना के जज्बे के सामने पाक सैनिकों ने आखिरकार घुटने टेक दिए, लेकिन इस युद्ध में जीत के लिए हमारे 527 जाबांज जवानों को हमने हमेशा के लिए खो दिया। सादाबाद तहसील क्षेत्र के भी कई जांबाज जवानों ने अपने देश की रक्षा के लिए कारगिल युद्ध में अपनी जान गंवाई, लेकिन बिंडवना यह रही कि कारगिल विजय दिवस पर भी देश पर जान न्योछावर करने वाले इन शहीदों की प्रतिमाएं दो फूलों के लिए तरसती रहीं। कोई भी राजनेता, जनप्रतिनिधि या अधिकारी शहीदों के स्मारकों पर शहीदों को श्रद्धांजलि देने नहीं पहुंचा।
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सादाबाद क्षेत्र के गांव नगला चौधरी निवासी रामकिशन सूबेदार के बेटे चौ. गजपाल सिंह ने कारगिल युद्ध में संघर्ष करते हुए देश की रक्षा करते हुए अपना बलिदान कर दिया था। शहीद का समाधि स्थल गांव में बना हुआ है, लेकिन इस समाधि स्थल पर कारगिल विजय दिवस के मौके पर कोई भी राजनेता, जनप्रतिनिधि और अफसर माल्यापर्ण कर श्रद्धांजलि देने तक नहीं पहुंचा। शहीद जाबांज के भाई योगवीर ने बताया कि उनके भाई ने अपनी जान देश पर न्योछावर कर दी, लेकिन कारगिल विजय दिवस पर कोई भी नेता, अफसर या जनप्रतिनिधि श्रद्धांजलि देने नहीं आया। सभी ने उनको भुला दिया। इधर, गांव नगला कल्हू कंजौली में भी शहीद हसन अली की समाधि स्थल पर भी कोई नहीं पहुंचा। शहीद हसन अली की पत्नी रीमा बेगम ने बताया कि कारगिल विजय दिवस पर उनके पति के समाधि स्थल पर श्रद्धांजलि देने के लिए न तो कोई नेता आया और न कोई अधिकारी या फिर जनप्रतिनिधि। किसी के पास वीर शहीदों के लिए थोड़ा सा भी वक्त नहीं निकला। शहीदों और शहीदों के परिवारों की यह कैसी उपेक्षा है।
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