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नहीं चेते तो पानी को तरसेंगी पीढ़ियां...

Mon, 11 Apr 2016 11:44 PM IST
हाथरस/अमर उजाला ब्यूरो
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तालाब में भरा गंदा पानी। - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो हाथरस
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हाथरस। जिले के बाशिंदे केवल दूषित पानी ही नहीं पी रहे हैं, बल्कि भविष्य में वह इस पानी के लिए भी तरसने वाले हैं। यह हम नहीं कह रहे, बल्कि भूगर्भ जल सर्वेक्षण विभाग के आंकडे़ भविष्य की भयावह तस्वीर पेश कर रहे हैं। जिले में भूगर्भ जल स्तर में गिरावट की समस्या दिन-प्रतिदिन गंभीर होती जा रही है। हालात ये हैं कि सात ब्लॉकों के इस जिले में चार ब्लॉक डार्क जोन में आ चुके हैं। हाल ही में एक और ब्लॉक डार्क जोन में जुड़ गया है। मतलब, इन इलाकों में भूगर्भ जल बेहद नीचे पहुंच चुका है। यदि यहां भूगर्भ जल संपदा का दोहन नहीं रुका तो आने वाले कुछ समय में यहां पानी के लिए हाहाकार मच सकता है। भावी पीढ़ियां तो मानो पानी के लिए तरस ही जाएंगी। सरकारी तंत्र इसे लेकर बिल्कुल बेपरवाह बना हुआ है। वाटर रिचार्जिंग के लिए बनी योजनाएं सरकारी लालफीताशाही की भेंट चढ़ रही हैं या फिर उनके नाम मिल रहे बजट का बंदरबांट हो रहा है।
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पाबंदी-जागरूकता के नाम पर दिखावा
हालांकि जो ब्लॉक डार्क जोन घोषित किए गए हैं, उनमें नए नलकूप लगाने पर पाबंदी लग चुकी है। भूजल का दोहन रोकने के लिए ग्रामीणों को जागरूक करने के दावे भी किए जा रहे हैं, लेकिन असल में स्थिति इसके विपरीत है। राजनीतिक सिफारिशों से यहां न केवल चोरी-छिपे नलकूपों के कनेक्शन बांटे जा रहे हैं, बल्कि जागरूकता कार्यक्रम भी कागजों पर सिमट गए हैं।


चार ब्लॉक पहले से डार्क, एक और हुआ
जिले के सात ब्लॉकों में से हाथरस, मुरसान, सादाबाद और सासनी तो पहले ही जल स्तर काफी नीचे जाने के कारण डार्क जोन में शामिल किए जा चुके हैं, जबकि एक ब्लॉक सहपऊ भी जल स्तर के मानक के हिसाब से डार्क जोन में पहुंच चुका है। लेकिन अभी तक शासन ने इसे सेमी डार्क जोन में ही शामिल किया है। बताते हैं कि यह ब्लॉक एक दशक पहले से ही डार्क जोन में था, लेकिन राजनीतिक सिफारिश से इसे सिर्फ इस वजह से डार्क जोन से बाहर कर दिया, ताकि यहां किसानों को नलकूप कनेक्शन मिलने का रास्ता साफ हो सके।
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पाबंदी की आड़ में वसूली का खेल
यह स्थिति जिले में सरकारी रिकॉर्ड में विगत 10 साल से भी अधिक समय से चल रही है, लेकिन इस समस्या से लड़ने के लिए शासन व प्रशासन के किसी भी अधिकारी के पास न तो कोई योजना है और किसी प्रकार की योजना पर काम करने के इरादे। सरकारी तंत्र इस समस्या को भी भुनाने में पीछे नहीं हैं। कानून का पालन कराने और किसानों को भूजल संपदा का दोहन करने से रोकने की बजाय इसकी आड़ में किसानों से मुंहमांगी कीमत वसूलकर उन्हें भूगर्भ जल के दोहन की खुली छूट दी जा रही है।


फाइलों में दबी आदर्श जलाशय योजना
भूगर्भ जल स्तर में आ रही गिरावट को रोकने के लिए शासन ने करीब एक दशक पूर्व आदर्श जलाशय योजना की शुरुआत की। मकसद था, तालाबों के जरिए भूगर्भ जल स्तर को उठाना। हर ग्राम पंचायत में एक-एक तालाब खुदवाना था, लेकिन आज तक यह योजना सिर्फ फाइलों पर ही दौड़ रही है। इसके बाद भी हर गांवों में तालाबों की खुदाई और सौंदर्यीकरण के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये जारी किए गए। इस पैसे का कहां और कैसे इस्तेमाल हुआ, इसका अंदाजा गांवों में तालाबों की बदहाली देखकर लगाया जा सकता है। जो नए तालाब बनाए जाने थे, वह भी आज तक या तो अधूरे पड़े हैं या फिर खुदे ही नहीं हैं, जबकि इनके नाम पर करोड़ों का खर्चा पंचायतें सरकारी रिकॉर्ड में दिखा चुकी हैं।

सघन वनीकरण में भी लीपापोती
भूगर्भ जल संरक्षण के लिहाज से ही इस जिले का चयन सघन वनीकरण योजना में भी किया गया, लेकिन पौधरोपण के नाम पर हर साल यहां करोड़ों रुपये बर्बाद किए जाते हैं मगर पौधों का आज तक कोई अता-पता नहीं है। 10 साल में आज तक बहुत कम पौधे ही छायादार पेड़ का आकार ले सके हैं।

दोगुने तक गिर गया जल स्तर
जानकारों की मानें तो जिले के कई इलाकों में भूगर्भ जल स्तर हर साल पांच से 10 फीट तक नीचे जा रहा है। डेढ़ दशक पहले जहां 70 से 80 फीट की बोरिंग पर पानी निकल आता था, वहां अब 125 से 150 फीट तक की बोरिंग करानी पड़ रही है। पानी जितना नीचे जा रहा है, उतना दूषित हो रहा है।

मनरेगा से वाटर रिचार्जिंग के कामों के लिए बजट का प्राविधान किया जाता है। जहां से भी तालाब की खुदाई या अन्य कामों के लिए डिमांड आती है, उसे प्राथमिकता पर स्वीकृति दी जाती है। जो पंचायतें या अधिकारी काम नहीं करते, उन पर कार्रवाई भी की गई है।
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-जावेद अख्तर जैदी, सीडीओ हाथरस
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