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हाथरस : हिंदी संस्कारों की सच्ची संवाहक

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हाथरस : एसके उपाध्याय। संवाद - फोटो : HATHRAS
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न्यूज डेस्क, अमर उजाला, हाथरस
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एक भाषा के रूप में हिंदी न सिर्फ भारत की पहचान है, बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति व संस्कारों की सच्ची संवाहक भी है। हिंदी बोलना हमारे लिए गर्व की बात है। हिंदी वैज्ञानिक भाषा है। जैसे लिखते हैं, वैसे ही बोलते हैं। शहर के बुद्धिजीवि और शिक्षक वर्ग ने सभी से मिलकर हिंदी को उसका गौरव वापस दिलाने की अपील की है। संवाद
यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हिंदी हमारी मातृभाषा है। हमें अंग्रेजी आती है या नहीं, यह मायने नहीं रखता। यदि हमें हिंदी नहीं आती है तो हमारे लिए शर्म की बात जरूर है। लोग झूठा दिखावा करते हैं। हमें ढोंग से बचना होगा। अक्सर लोगों को कहते सुना है कि हमारी हिंदी कमजोर है। यह मनोबल गिराने वाली बात है। हम बच्चों से कहते हैं कि अंग्रेजी मजबूत होनी चाहिए, लेकिन उससे पहले हिंदी मजबूत होनी चाहिए।
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-भारती कौशिक, प्रधानाचार्य यूसीएमके
हिंदी ही वो माध्यम है, जिसके जरिये आज हम समाजसेवा का कार्य कर रहे हैं। हिंदी हृदय की भाषा है। हिंदी के जरिये हम अपनी बात को एक-दूसरे तक आसानी से पहुंचा सकते हैं। भारत के सर्वांगीण विकास में हिंदी की अहम भूमिका है। हम सबकी यह जिम्मेदारी है कि हम हिंदी का सम्मान करें।
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-सुनील अग्रवाल, समाजसेवी
हिंदी देश के मन की भाषा है। इसे मान की भाषा बनाया जाना जरूरी है। नई शिक्षा नीति में हिंदी को विशेष महत्व दिया गया है। सभी लोगों को अधिक से अधिक हिंदी बोलने के लिए प्रेरित करना होगा। हिंदी हृदय के साथ संस्कार प्रदान करने वाली भाषा है। अपनी मातृभाषा का सम्मान करना चाहिए।
-एसके उपाध्याय, बुद्धिजीवी

हाथरस : सुनील अग्रवाल। संवाद- फोटो : HATHRAS

हाथरस : भारती कौशिक, प्रधानाचार्य। संवाद- फोटो : HATHRAS

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