अशोक वार्ष्णेय
सादाबाद। 26 जुलाई को कारगिल की जंग को 22 साल पूरे हो जाएंगे। इन 22 सालों में शहीदों के परिवार के जख्म भर पाना नामुमकिन है। 26 जुलाई आते ही हर उस परिवार के जख्म हरे हो जाते हैं, जिन्होंने उस युद्ध में अपने बेटे, भाई, पति या पिता को खोया है। बहनें एक बार फिर राखी को देखकर रो पड़ती हैं। मां-बाप घर के कोने में खड़ी लाठी का सहारा लेकर बाहर अकेले ही निकल पड़ते हैं, क्योंकि कारगिल युद्ध ने इनसे इनके बुढ़ापे का सहारा छीन लिया है।
वर्ष 1999 में हुए कारगिल युद्ध में सादाबाद की वीरभोग्या वसुंधरा के कई जांबाज भी वतन के लिए शहीद हो गए। इन जांबाजों की शहादत से सादाबाद का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज तो हो गया, लेकिन शहीदों के परिवार आज भी उपेक्षा के शिकार हैं। हुक्मरानों ने इनकी समस्याओं पर कोई ध्यान ही नहीं दिया और न ही कभी यह देखने की कोशिश की कि इनकी क्या दशा है। जो सुविधाएं इन्हें मिलनी चाहिए थीं, उनसे वह आज भी वंचित हैं। संवाद
शहीद गजपाल के प्रतिमा स्थल का रास्ता बहदाल
सादाबाद की ग्राम पंचायत नौगांव के मजरा नगला चौधरी निवासी रामकिशन सूबेदार के बेटे चौ. गजपाल सिंह ने भी कारगिल युद्ध में वीरता का परिचय देते हुए पाकिस्तानी फौज और आतंकियों से जमकर संघर्ष किया था। संघर्ष के बाद उस समय अचानक प्राकृतिक रूप से बर्फीले तूफान में गजपाल सिंह सहित आधा दर्जन सैनिक फंस गए थे। गजपाल का शव 45 दिन बाद मिला था। शहीद गजपाल के पिता भी सेना से 1997 मे सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। उन्होंने 1995 में जाट रेजीमेंट मे अपने पुत्र गजपाल को देश की सेवा के लिए भर्ती कराया था। रामकिशन ने बताया कि सरकारी मशीनरी का यह हाल है कि कोतवाली, तहसील या अन्य सरकारी दफ्तरों में किसी भी कार्य के लिए जाया जाए तो कोई भी तवज्जो उन्हें और उनके परिवार को नहीं मिलती। उन्होंने बताया कि उनके बेटे गजपाल के प्रतिमा स्थल तक जाने के लिए रास्ता पिछले कई सालों से बहदाल पड़ा हुआ है, लेकिन आज तक किसी ने सुध नहीं ली है। कई बार वाहन चालक गिरकर घायल हो चुके हैं। उनके मकान के आगे सड़क पर गंदा पानी भरा रहता है, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।
हसन अली के गांव में प्रशासन ने नहीं कराया गेट का निर्माण
कारगिल युद्ध में शहीद हुए रणबांकुरों में नगला कल्हू कंजौली निवासी हसन अली पुत्र अशरफ अली खां का भी नाम आता है। हसन अली के भाई गफूर ने बताया कि उनके भाई देश के लिए शहीद हो गए, लेकिन आज तक प्रशासन ने शहीद गेट का निर्माण नहीं कराया। उनके स्मारक पर आज तक पानी पीने तक की कोई सुविधा नहीं है। मकान के आगे पानी निकासी की सुविधा भी नहीं है। शहीद गेट के लिए उन्होने कई बार अधिकारियों के यहां शिकायती पत्र भी दिए, लेकिन आज तक उनकी सुनवाई नहीं हुई है। कोई अधिकारी सुनता नहीं है, इसलिए अब शिकायत करना भी छोड़ दिया है। अब शहीद हसन अली का बेटा भी देश सेवा में जुटा हुआ है।
शहीद सत्यप्रकाश के प्रतिमा स्थल तक नहीं बन सकी सड़क
गांव वेदई के सत्यप्रकाश सिंह परमार पुत्र लखमी सिंह परमार ने भी देश की रक्षा की खातिर कारगिल युद्घ में दुश्मनों से लोहा लेते हुए हंसते-हंसते अपने प्राण त्याग दिए, लेकिन गांव में शहीद स्मारक गेट से लेकर शहीद प्रतिमा स्थल तक सड़क का निर्माण नहीं किया गया है। सत्यप्रकाश के भाई इंदल सिंह ने बताया कि उन्होंने कई बार सड़क बनवाने के लिए अधिकारियों को पत्र दिए, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई। आज तक मार्ग ऊबड़ खाबड़ स्थिति में है। अब सत्यप्रकाश का बेटा भी सेना में भर्ती होकर देश सेवा कर रहा है।
पिता ने खुद बनवाया शहीद बेटे सत्यवीर का स्मारक
क्षेत्र के ही गांव भूतिया निवासी सत्यवीर भी कारगिल युद्घ में शहीद हो गए। बताते हैं कि जब सत्यवीर शहीद हुए। तभी उनके पिता की आंखों की रोशनी भी चली गई थी। बताते हैं कि अब उनके पिता भी इस दुनिया में नहीं हैं। सत्यवीर के शहीद होने के वक्त प्रशासन और सरकार ने प्रतिमा स्थल बनवाने का वादा किया था, लेकिन बताते हैं कि खुद उनके ही पिता ने अपने बेटे का शहीद स्मारक बनवाया।