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हाथरस के रंगों में फिर डूबेंगे देश-विदेश

Wed, 02 Mar 2016 12:24 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो
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हाथरस। रस की नगरी हाथरस का गुलाल और रंग एक बार फिर होली पर देश भर में बिखरेगा। पिछले कई महीनों से यहां गुलाल और रंग की फैक्ट्रियों में लगातार काम चल रहा है और आर्डर के हिसाब से माल की आपूर्ति भेजी जा रही है। सैकड़ों लोग यहां के दशकों पुराने इस उद्योग से जुड़े हैं। इन-दिनों शहर की गुलाल व रंग की फैक्ट्रियों में कई शिफ्टों में इस समय काम हो रहा है। हाथरस में इस समय दर्जन भर से ज्यादा रंग और गुलाल की फैक्ट्रियां हैं। कुछ व्यापारी केवल पैकिंग के काम तक सीमित हैं। यहां का यह उद्योग करीब 90 साल पुराना है।पुराने जानकारों की माने तो किसी समय तो देश भर में गुलाल केवल हाथरस में ही बनता था। अब हालांकि अन्य राज्यों में भी रंग-गुलाल बनने लगा है। यहां के  रंग-गुलाल की दूर-दूर तक मांग है। स्टार्च को रंग और अन्य रसायनों में मिलाकर गुलाल बनाया जाता है। यहां मुख्य रूप से गुलाबी, हरा, लाल, पीला, केसरिया रंग का गुलाल बनता है। इसके लिए कच्चा माल मद्रास, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, पंजाब आदि जगहों से आता है। होली पर लगभग ज्यादातर स्थानों पर हाथरस के रंग की डिमांड होती है। जहां-जहां होली खेली जाती है,  वहां-वहां हाथरसी गुलाल और रंग जाता है। फिल्म सिटी मुबंई के भी काफी बड़े दुकानदार यहां फैक्ट्रियों से रंग-गुलाल की सप्लाई मंगाते हैं और फिर यह गुलाल और रंग फिल्मी दुनिया में भी होली पर उड़ेला जाता है। प्रदेश के अन्य हिस्सों के अलावा पंजाब, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा आदि प्रदेशोें के अलावा विदेश में भी जाता है।
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फीका पड़ रहा हाथरस का रंग उद्योगसरकारी प्रोत्साहन के अभाव और समस्याओं की मार से हाथरस का गुलाल और रंग फीका भी पड़ता जा रहा है। सबसे बड़ी समस्या तो टैक्स की है। यूपी में गुलाल और रंग पर पांच प्रतिशत टैक्स है, लेकिन उत्तराखंड, राजस्थान, छत्तीसगढ़ राज्यों में गुलाल टैक्स से मुक्त है। इसकी वजह से आसपास के प्रदेशों में यह उद्योग पनप रहा है। लेबर की समस्या से भी यह उद्योग जूझ रहा है। बिजली संकट से भी यहां के उद्योग-धंधे पर असर पड़ रहा है। यह काम सीजनेविल है। दीपावली से यह काम शुरू हो जाता है और होली तक रहता है। उसी समय यहां आलू की खुदाई का काम शुरू होता है, जिससे लेबर का संकट खड़ा हो जाता है। ट्रांसपोर्टेेशन की समस्या भी उद्योग में बाधक बनी हुई है। ट्रांसपोर्टेशन की सीधी व्यवस्था नहीं होने से ट्रकों में चार-चार बार माल को चढ़ाना-उतारना पड़ता है। समय पर माल नहीं पहुंच पाता और इससे भी यहां के उद्यमियों की साख को बट्टा लगता है। उन्हें आर्थिक क्षति भी पहुंचती है।
बोले उद्यमी- उत्तर प्रदेश में गुलाल पर टैक्स है, जबकि छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, राजस्थान में गुलाल पर टैक्स नहीं है। किसी समय में उक्त राज्यों में यहां से काफी माल जाता था, लेकिन अब यहां से वहां काफी कम ऑर्डर आते हैं। उल्टा वहां से यहां माल आ रहा है। वहां इस कारोबार को सुविधाएं मिलने से काफी फ ल-फूल रहा है।- देवेंद्र गोयल, रंग उद्यमी- टैक्स की मार तो यह उद्योग झेल ही रहा है, साथ ही ट्रांसपोर्टेशन और मजदूरों की भी समस्या है। बिजली संकट से भी परेशानी खड़ी होती है। रंग-गुलाल का कारोबार समस्याओं से जूझ रहा है। शासन-प्रशासन को इस बारे में ध्यान देना चाहिए। सुविधाओं के अभाव में कारोबार लगातार नीचे गिर रहा है। - विनोद मित्तल, रंग उद्यमी।
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