संवाद न्यूज एजेंसी, हाथरस।
कई दिनों की जद्दोजहद के बाद स्थानीय आवास-विकास कॉलोनी निवासी आशीष की अपने वतन वापसी हो गई। वतन वापसी के समय आशीष मां और उसका छोटा भाई उनको लेने के लिए दिल्ली एयरपोर्ट पहुंचे। मां ने मिलते ही आशीष को गले लगा लिया। आशीष ने यूक्रेन में आंखों देखा हाल परिवार वालों को बताया। उन्होंने यह भी बताया कि यूक्रेन के वासियों ने उनके साथ कैसा बर्ताव किया है।
आशीष ने एडवाइजरी जारी होने के बाद से शुरू हुए सफर का एक वाकया साझा करते हुए बताया कि 22 फरवरी को दूतावास की ओर से एडवाइजरी जारी की गई थी। इसके तहत यूक्रेन को छोड़ने की बात कही गई, लेकिन यूनिवर्सिटी में ऑफलाइन क्लास चल रही थीं।
यूनिवर्सिटी प्रबंधन से वार्ता की तो उन्होंने क्लास लेने के बारे में कहा। आशीष ने बताया कि हालांकि इस दौरान उन्होंने अपनी 28 फरवरी को वतन वापसी की टिकट कराई, लेकिन 24 फरवरी की सुबह यूक्रेन पर हमला शुरू हो गया।
सुबह करीब चार बजे बम धमाके की आवाजें सुनाई देने लग र्गइं। आसमान में धुआं दिखाई देने लग गया। सायरन बजने लगे और मोबाइल फोन पर कॉल आने शुरू हो गए। वह जिस फ्लैट में रहते थे, वहां बंकर नहीं था। उन्होंने तुरंत अपने कुछ जरूरी सामान को पैक कर लिया।
यहां से तिगुने रेट में टैक्सी कर अपने मित्रों के फ्लैट पर पहुंचे, यहां से अपने मित्रों के फ्लैट के नीचे बने बंकरों में पहुंच गए। माइनस में टेंपरेचर था। यूक्रेन के कीव में रूसी सैनिकों ने एंट्री कर ली थी, लेकिन नागरिकों से कुछ नहीं कह रहे थे। बंकर में एक साथ सभी मित्र ठहरे। पहले एक दिन एक रात बंकर से बाहर तक नहीं निकले।
खारकीव में शहर के लाइट काट दी गई। इस बीच फायरिंग शुरू हो गई। आशीष ने बताया कि जिस रास्ते से दूसरे बंकर को जाने वाले थे, वहां धमाके होने की सूचना मिली। हैरानी की बात यह थी कि यूक्रेनियन हमें बंकर में अंदर नहीं जाने दे रहे थे। तीसरे फ्लैट पर पहुंचे तो वहां के बंकर में पांच दिन रहे।
दूतावास ने खरकीव खाली करने के लिए एडवाइजरी जारी कर दी। आंखों के सामने एयर स्ट्राइक हो रही थी। अब रूसी सेना ने सिविलियन को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया। यूक्रेनियन को मारना शुरू कर दिया। हमारे वरिष्ठ छात्रों की कैब रोक ली, लेकिन उसके बाद भारतीय होने की बात बताने पर जान बची।
रेलवे स्टेशन खारके बुकसाल पर यूक्रेनियन इंडियन को घुसने नहीं दे रहे थे। एक-एक व्यक्ति की एंट्री पर पैसा लिया जा रहा था। नाइजीरिया व कुछ अन्य देशों के लोग निकल चुके थे। भारतीयों के साथ अभद्र व्यवहार किया जा रहा था। उन्होंने बताया कि खारके बुकसाल से ट्रेन से 18 घंटे का सफर 30 घंटे में पूरा हुआ।
खारकीव से लबीव पहुंचे। यहां से रोमानिया, पोलैंड व हंगरी नजदीकी हैं। 30 घंटे तक ट्रेन में खड़े होकर सफर किया। इस दौरान दवा, कच्ची ब्रेड और पानी पीकर उसने बुुखार में सफर तय किया। आशीष ने बताया कि उसे बुखार भी आ रहा था।
लोको पायलट ने बीच जंगल में ट्रेन में रोक दी थी और 600 डॉलर मांगे, वरना बीच जंगल में उतारने की धमकी दी। आशीष ने कहा कि लवीब में पहुंचकर राहत की सांस ली। हालांकि वहां भी सायरन बज गए। हम 22 लोगों ने मिलकर मिनी वैन की। लवीब से चार-पांच घंटे के सफर के लिए हमने 80 हजार रुपये में मिनी वैन की। उसने उन्हें हंगरी सीमा पर पहुंचाया। इमीग्रेशन में करीब 12 घंटे लगे।