संवाद न्यूज एजेंसी, सासनी-हाथरस।
सासनी का कांच उद्योग टुकड़े -टुकड़े होकर बिखर गया है। कभी यहां 100 से ज्यादा कांच फैक्टरी संचालित होती थी लेकिन पिछले कई दशक से इनकी चिमनियों से धुआं नहीं निकला। ज्यादातर के भवन भी खंडहर हो चुके हैं। सरकारी प्रोत्साहन के अभाव में यहां का कांच उद्योग पिछड़ता चला गया। कांच के स्थान पर प्लास्टिक की डिमांड भी इसकी मुख्य वजह रही। उद्यमियों की अन्य जरूरतें भी पूरी नहीं हो पाई।
वर्ष 1942 में सासनी में सबसे पहले कांच की फैक्ट्री खुली। इसके बाद यहां लगातार कांच उत्पाद बनाने वाले कारखाने खुलते चले गए। इन फैक्टरियों में कांच की शीशियां, जार, गिलास, गुलदस्ता, पेपर वेट, गोली सोडा बोतल, कप प्लेट से लेकर ट्रेनों की हेड लाइट तक बनती थी।
कांच उद्योग से जुड़े लोग बताते है कि इस उद्योग के पिछड़ने का मुख्य कारण बाजार में प्लास्टिक के सामान की मांग बढ़ना रहा। इससे कांच के आइटमों की खपत पर बुरा असर पड़ा। शासन प्रशासन ने भी इस उद्योग के लिए सस्ते दरों पर कैरोसिन की आपूर्ति, गैस सप्लाई निर्बाध बिजली कटौती जैसी कोई सुविधा नहीं दी।
इस कारण बाजार में कांच का उत्पादन महंगा होने लगा और लाभ कम होने लगा। नतीजन यह उद्योग पिछड़ता चला गया। हजारों हाथों को काम देने वाले कारखाने भी धीरे धीरे बंद होते चले गए। काफी लोगों का रोजगार इसकी वजह से छिन गया।
यह थी इस उद्योग की जरूरतें
सस्ती दरों पर केरोसिन , गैस व बिजली की सप्लाई , सस्ते कर्ज , यातायात की सुविधा इस उद्योग की प्रमुख जरूरतें थीं, लेकिन इन्हे सुलभ करने के लिए कोई पहल नहीं हुई। नतीजा उद्यमियों इस उद्योग से अपने हाथ पीछे खींच लिए।
क्या कहती है सासनी की जनता
संसाधनों के अभाव में यह उद्योग चौपट हो गया। पूंजीपतियों ने निवेश करना बंद कर दिया। शासन प्रशासन की उदासीनता एवं क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले लोग बाहरी होने के कारण उन्होंने विकास की बात को नहीं उठाया।
निर्देश चंद वार्ष्णेय
सुविधाएं उपलब्ध न होने के कारण कारखाना संचालकों को कारखाने बंद करने पर मजबूर होना पड़ा। बाजार में कांच के आइटम मंहगे साबित होने लगे। इनकी खपत कम हो गई। मजदूरों को उचित मजदूरी भी नहीं मिल पाती थी। इस कारण मजदूरों के बच्चों के मुंह से निवाला भी छिन गया था
प्रकाश चंद वार्ष्णेय
कांच उद्योग की जरूरतें पूरी न होने के कारण धीरे धीरे कांच की इकाइयां बंद होती चली गई। बाजार में प्लास्टिक के आइटम आ गए। कांच का उत्पादन मंहगा हो गया। संसाधन के अभाव में पूंजीपति बाहर चले गए।
मनोज अग्रवाल।