राकेश वार्ष्णेय
सिकंदराराऊ। कस्बा पुरदिलनगर में कांच के मूंगा-मोती बनाने का कारोबार अंतिम सांसें गिन रहा है। वर्ष 2005 के बाद बाजार में आए चीन के कांच उत्पादों की चकाचौंध में पुरदिलनगर के कांच उत्पादों की चमक दबकर रह गई। धीरे-धीरे पूरे बाजार पर चीन के आयटमों का कब्जा हो गया। मूंगा-मोती बनाने वाली इकाइयां एक के बाद एक बंद होती गईं। निर्माताओं ने पुराना काम बंद कर रोजगार का नया जरिया बना लिया। अब यहां मूंगा-मोती बनाने वाली चंद इकाइयां ही रह गई हैं, लेकिन संसाधनों की कमी और चीन के अलावा देश के अन्य हिस्सों में तैयार हो रहे माल से मिल रही कड़ी टक्कर की वजह से इनके सामने भी अस्तित्व बचाने की चुनौती है।
पुरदिलनगर में मूंगा-मोती बनाने का यह काम आजादी से पहले का है। पहले यहां सुहाग के नीली, पीली, लाल और हरे रंग की चूड़ियों के साथ रंगीन नगीने बनते थे। काम का विस्तार हुआ तो यहां कई हस्तनिर्मित नग बनने लगे। इनकी मांग देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी थी। कई देशों में यहां के नगीने जड़े गहने पसंद किए जाते थे। 2005 तक का समय इस कारोबार के लिए स्वर्णिम काल रहा, लेकिन उसके बाद जब चीन के उत्पाद बाजार में उतरे तो यहां के उत्पादों की मांग घटने लगी। वर्तमान में कस्बे में केवल 10 फीसदी ही कांच के उत्पाद बनाने का काम रह गया है। उद्यमियों का कहना है कि अगर उन्हें भी चीन की तरह सुविधाएं मिलें तो वह चीनी निर्माताओं के दांत खट्टे कर सकते हैं। संवाद
हम किसी से कम नहीं हैं, लेकिन मशीन, बेहतर ऊर्जा तकनीकी न मिलने से यहां का काम पिछड़ गया है। कांच के काम के लिये अब काफी औद्योगिक गैस की जरूरत होती है, लेकिन अब तक हमारे कारीगर मिट्टी के तेल चलित छोटी मशीन पर कलाकृति बनाते रहे हैं। अब कुछ जगह एलपीजी गैस का प्रयोग कर आयटम बना रहे हैं, लेकिन इन पर लागत ज्यादा आती है। -कमल जाखेटिया, निर्माता
इस कारोबार की बेहतरी के लिए यहां क्लस्टर बनना जरूरी है। एक ही जगह जब सभी सुविधाएं मिलेंगी तो उत्पाद भी अच्छी गुणवत्ता के बनेंगे। इन पर आने वाली लागत भी कम हो सकेगी, जिससे हम चीनी माल का मुकाबला बेहतर ढंग से कर सकते हैं। सरकार को इस कारोबार के महत्व को समझते हुए इसे प्रोत्साहित करने के लिए कदम उठाने होंगे।
-हर्षकांत कुशवाहा, पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष व निर्माता
कब से एक जिला-एक उत्पाद (ओडीओपी) में इस कारोबार को शामिल करने की मांग राज्य सरकार से की जा रही है, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। अगर इस योजना में यह कारोबार शामिल हो जाता है तो इसे देश भर में पहचान मिलेगी। यहां के उत्पादों के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म चाहिए। हम सांसद-विधायक से भी मिले हैं, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।
-हाजी शकील, निर्माता
सरकार हमें तकनीकी, मशीनें और विशेषज्ञ उपलब्ध कराए। हम उनसे बहुत जल्दी सीखकर अच्छी गुणवत्ता का माल बना सकेंगे। कांच का कारोबार ठप होने के कारण हमने लोहे काम शुरू किया है। एक बार मोदी जी ने अपनी मन की बात में कांच के कारोबार जिक्र किया था। तभी हम बाट जोह रहे हैं कि कब उनकी नजर-ए-इनायत इस कारोबार पर होगी।
-मोहम्मद अनवार, कारोबारी
इन सुविधाओं की है दरकार
इस कारोबार के लिए औद्योगिक गैस की आपूर्ति, डिजिटल प्लेटफॉर्म, आधुनिक तकनीक के साथ मशीनों की उपलब्धता जरूरी है। बनारस में पहले पुरदिलनगर के से माल जाता था, लेकिन वहां अब आधुनिक मशीनें लग गई हैं, जिससे वहां का कारोबार तेजी से बढ़ रहा है।
यह आयटम बनते हैं कांच के
चूड़ी, कड़े, छोटे नगीने आदि उत्पाद ही वर्तमान में यहां बन रहे हैं। पूर्व में कस्बे के घर-घर में यह काम होता था। हजारों कारीगर इस काम से जुड़े थे।
पुरदिलनगर का कांच उद्योग एक नजर में
-20 भट्टियां हैं वर्तमान में कांच के चूड़ी और कड़े बनाने की
-50 करीब स्थानों पर एलजीपी गैस से कांच की कलाकृतियां बनाई जा रही हैं
-03 से 05 किग्रा तक कांच की कलाकृतियां बना पाता है एक कारीगर
-200 से 300 रुपये प्रति किलो तक बिकता है यह माल
-10 करोड़ रुपये करीब सालाना टर्न ओवर है इस कारोबार का
-700 करोड़ रुपये सालाना टर्न ओवर था इस कारोबार का 2005 तक
इस संबंध में उद्यमियों की ओर से कोई पहल नहीं की गई है। इस कारण उद्योग से संबंधित कोई प्रस्ताव शासन को नहीं भेजा गया है। उद्योगों को प्रोत्साहन देने के लिए जो योजनाएं चल रही हैं, उद्यमी उनका लाभ ले सकते हैं।
-दुष्यंत कुमार, उपायुक्त जिला उद्योग एवं उद्यम प्रोत्साहन केंद्र