जिले में शराब की दुकानों का विरोध थमने का नाम नहीं ले रहा। यह विरोध मुख्य रूप से देसी शराब के ठेकों का है, जिनसे अक्सर मजदूर वर्ग जुड़ा रहता है। एक महीने में गांव टुकसान का विरोध जिले में चौथी घटना है। कुल मिलाकर ये ठेके कानून व्यवस्था के लिए खतरा बनते जा रहे हैं।
लगातार तीन दिन तक विरोध होने की यह पहली घटना है। जितनी भी जगह हंगामा व उपद्रव हुए, उनमें महिलाओं का एक ही तर्क था कि उनके परिवार के पुरुष अपनी कमाई शराब में झोंक रहे हैं। कोई तो कमा भी नहीं रहा। आरोप है कि गांव-गांव ठेके खुलने के कारण पुरुष शराब पीते हैं और फिर घर आकर महिलाओं व बच्चों से मारपीट करते हैं।
प्रदेश में सबसे कम दुकानें, फिर भी राजस्व 372 करोड़
आबकारी अधिकारियों के अनुसार प्रदेश के 75 जिलों के सापेक्ष हाथरस में सबसे कम शराब की दुकानें हैं। विभाग के अनुसार जिले में कंपोजिट (अंग्रेजी व बियर) की दुकानें 47 हैं और देसी शराब के ठेके 62 हैं। कम दुकानें होने के बावजूद पिछले वर्ष का राजस्व 372 करोड़ रुपये रहा है। इस बार का लक्ष्य करीब 450 करोड़ रुपये है।
जिले में पहले भी हुआ विरोध
देसी शराब के ठेके का जिले में पहले भी विरोध होता रहा है, लेकिन ऐसा पहली बार है, जब लगातार इस तरह की घटनाएं हुई हों। दो साल पहले सहपऊ के गांव गुतहरा व रहपुरा में विरोध हुआ था। दो साल पहले सादाबाद के गांव खमानी गढ़ी में मंदिर निकट शराब ठेका खुलने का ग्रामीणों ने विरोध किया था। एक साल पहले सादाबाद के गांव जटोई में भी विरोध प्रदर्शन हुआ था। इस साल अब तक पांच घटनाएं हो चुकी हैं।
केस-1
सहपऊ क्षेत्र के गांव में सिखरा में 31 मार्च की दोपहर को ठेका देसी शराब खोलने का ग्रामीणों ने विरोध कर दिया। मौके पर पहुंची पुलिस व आबकारी विभाग की टीम से ग्रामीणों की तीखी नोकझोंक हुई। काफी समझाने के बाद भी जब ग्रामीण नहीं माने तो पुलिस ने बल प्रयोग कर भीड़ को वहां से हटा दिया। ग्रामीणों ने पुलिस पर मारपीट का आरोप लगाया है।
केस-2
14 जून को आगरा रोड एचडीएफसी बैंक के सामने स्थित देसी शराब के ठेके का नवीपुर की महिलाओं ने विरोध किया था। ठेके पर पथराव भी किया था, लेकिन पुलिस ने समय रहते मामला संभाल लिया था।
केस-3
हसायन के गांव बस्तोई में 29 जून को महिलाओं ने शराब के ठेके का विरोध करते हुए तोड़फोड़ की थी और फिर शराब की 50 पेटियां नष्ट कर दीं। प्रकरण में उपद्रव करने वालों पर एफआईआर भी दर्ज हुई।