आज विश्व डाक दिवस मनाया जाएगा। इस मौके पर हाथरस शहर के शैलेंद्र सराफ का जिक्र करना लाजिमी है, जिन्होंने देश-विदेश के करीब 2.5 लाख डाक टिकटों का संग्रह कर लिया है। विश्व के 195 में से करीब 170 देशों के डाक टिकट का संग्रह इनके पास है। इनमें वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद जारी किए गए लिफाफे के साथ तमाम देशों में जारी डाक टिकट शामिल हैं। उनका सपना है कि यह संग्रह गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकाॅर्ड में दर्ज हो।
हाथरस के सीकना पान गली निवासी शैलेेंद्र सराफ के पास दुनिया के कई देशों में जारी हुए अधिकांश डाक टिकट मौजूद हैं। वह कहते हैं कि उनके चाचा वैज्ञानिक स्व. डाॅ. रमेश चंद्र वार्ष्णेय अमेरिका में रहते थे। चाचा हर सप्ताह अमेरिका से पत्र भेजा करते थे, जिस पर रंगीन डाक टिकट लगा होता था, जबकि उस वक्त भारतीय डाक टिकट श्वेत-श्याम होते थे। तब उनकी उम्र मात्र 12 वर्ष की थी, तभी से डाक टिकटों के संग्रह की दिलचस्पी बढ़ गई और वे ऐसे टिकटों का संग्रह करने लगे।
वह हर एक ऐसे परिवार से मिलने जाते थे, जिनके रिश्तेदार विदेशों में रहते हैं, उनके यहां आने वाली डाक को वह उनसे ले लेते थे और उसका संग्रह करते थे। करीब 40 साल से वह लगातार डाक टिकटों का संग्रह कर रहे हैं। आज भी उन्हें कोई डाक टिकट मिलता है तो उसे संग्रह में रख लेते हैं।
नेपाल, रूस, चीन, इंग्लैंड, अफगानिस्तान, इटली, हांगकांग, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, जापान, भूटान, मालद्वीव, मॉरीशस, यूक्रेन, अमेरिका, कनाडा, अफ्रीका, सूडान, कुबैत, इराक, इरान, वर्मा, श्रीलंका, तंजानिया, सीरिया, वेस्ट इंडीज, नाईजीरिया, अर्जेंटीना, फ्रांस, गुआना, तजाकिस्तान, नार्वे, पुर्तगाल, जर्मनी, हंगरी, माल्टा, तुर्की, डेनमार्क, स्पेन आदि देशों के टिकट उनके संग्रह में हैं।