महिलाओं की सेहत सुधारने के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा चलाए गए सघन उपचार कार्यक्रम के चलते एनीमिया (खून की कमी) से जूझ रहीं 966 महिलाएं अब गंभीर जोखिम वाले ग्राफ से बाहर आ गई हैं। आयरन सुक्रोज के सफल इस्तेमाल से इन महिलाओं का हीमोग्लोबिन स्तर सात से उठकर 10 ग्राम प्रति डेसिलीटर से ऊपर पहुंच गया है, जिससे उनकी जान पर बना खतरा अब टल गया है।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार पिछले अभियान और जांच शिविरों के दौरान कुल 2948 महिलाओं को एनीमिया से पीड़ित पाया गया था। इनमें से अधिकांश महिलाओं का हीमोग्लोबिन स्तर काफी कम था, जो प्रसव या सामान्य जीवन के लिए एक गंभीर मेडिकल स्थिति मानी जाती है। विभाग ने इन महिलाओं की सूची तैयार कर उनकी विशेष निगरानी शुरू की थी।
डीएम अतुल वत्स की निगरानी में दिसंबर से आयरन सुक्रोज सप्ताह की शुरुआत की गई। हर माह के तीसरे सप्ताह होने वाले इस कार्यक्रम में जिले की प्रत्येक प्रसव यूनिट पर सात व उससे नीचे वाली हीमोग्लोबिन वाली महिलाओं को आयरन सुक्रोज की दवा चढ़ाई जाती है।
आयरन सुक्रोज बना जीवन रक्षक
जब आयरन की गोलियों से काम नहीं चलता तो आयरन सुक्रोज का सहारा लिया जाता है। खासकर गभर्वती महिलाओं के लिए, जिससे उनका प्रसव सामान्य हो सके। आयरन सुक्रोज इंट्रावेनस दवा है, जिसे सीधे नस में दिया जाता है। आयरन की सीधे खुराक मिलने से लाल रक्त कोशिकाएं तेजी से बनती हैं। इसी वजह से पिछले तीन महीने में 966 महिलाएं जोखिम से बाहर आ गई हैं, जिनका सामान्य प्रसव होने की उम्मीद है। स्वास्थ्य टीम इन पर नजर बनाए हुई है।
हाई रिस्क प्रेग्नेंसी (एचआरपी) का मुख्य कारण एनीमिया है, इसलिए पहले इससे निपटाने के लिए विशेष अभियान चल रहा है। शुरुआती परिणाम संतोषजनक हैं। इसी दिशा में आगे बढ़ा जा रहा है। आयरन सुक्रोज हमारा आखिरी हथियार है, इसलिए आवश्यक है कि महिलाएं प्रारंभ से खानपान पर ध्यान दें। नौवें महीने की शुरुआत से ठीक खानपान से हीमोग्लोबिन का सही स्तर पाया जा सकता है।
-डाॅ. राजीव गुप्ता, एसीएमओ