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जिला अस्पताल के जन औषधि केंद्र पर दवाओं का टोटा
क्रासर
जिला अस्पताल में कम कीमत पर दवा की उम्मीद को लग रहा झटका
केंद्र संचालक ने 700 से अधिक दवाओं की भेज रखी है डिमांड
अमर उजाला ब्यूरो
हाथरस। केंद्र सरकार ने जरूरतमंदों को कम कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने के लिए जन औषधि केंद्र तो खुलवा दिया, लेकिन जिला अस्पताल में खुले इस केंद्र पर दवाओं का भारी टोटा है। गिनी-चुनी 3 दर्जन दवाएं ही मिल पा रही हैं। अन्य दवाओं के लिए रोगियों और उनके तीमारदारों को प्राइवेट मेडिकल स्टोरों पर जाना पड़ रहा है।
केंद्र सरकार ने आम मरीजों को राहत देने के लिए प्रधानमंत्री जनऔषधि योजना लागू की थी। इसके तहत सरकारी अस्पतालों में मरीजों को काफी कम कीमत पर जरूरी दवाएं उपलब्ध कराई जानी हैं। योजना के तहत जिला अस्पताल में जन औषधि केंद्र खोला गया। तीन सितंबर को अधिकारियों और विधायक द्वारा इस केंद्र का उद्घाटन किया गया, लेकिन 22 दिन बीतने के बावजूद केंद्र में जरूरी दवाई उपलब्ध नहीं हो रहीं। कम कीमत पर दवाएं लेने के लिए रोजाना सैकड़ों मरीज केंद्र पर आते हैं और दवा नहीं मिलने पर निराश होकर लौट जाते हैं। यहां पर कुछ दवाएं ही उपलब्ध हैं। काफी दवाएं तो अभी इस केंद्र पर हैं ही नहीं। दूर-दराज से आए मरीजों को अभी भी बाहर से दवा लेनी पड़ती हैं। केंद्र पर करीब 700 प्रकार की दवा आना बाकी है।
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क्यों हैं ये दवाएं सस्ती
डॉक्टर आपको जो दवाएं लिखते हैं, वह काफी महंगी होती हैं। दवा एक तरह का साल्ट होती है, जिसे एक बीमारी के इलाज के लिए कई रिसर्च और स्टडी के बाद तैयार किया जाता है। इसको कंपनियां अलग-अलग नाम से बेचती है। उसी साल्ट की जेनरिक दवा बहुत सस्ती होती है। इनमें कई बार 90 फीसदी से भी ज्यादा का अंतर होता है। जेनेरिक नाम साल्ट के कंपोजिशन और बीमारी को ध्यान में रखते हुए एक विशेष समिति निर्धारित करती है। किसी भी साल्ट का जेनेरिक नाम दुनियाभर में एक जैसा होता है। इनका असर ब्रांडेड दवाओं से कम नहीं होता है। इनकी कीमत सरकार के हस्तक्षेप से तय होती हैं, इसलिए यह सस्ती होती है।
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बातचीत...
मेरे दाद हो गया है। अस्पताल में दवा है नहीं। चिकित्सक ने बाहर की दवा लिख दी है। मैं जन औषधि केंद्र आई तो यहां भी नहीं है। बाहर से करीब 50 रुपये की दवा मिलेगी और केंद्र पर करीब 10-15 रुपये की मिल जाती है।
-प्रीति
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बच्चे के बंदर काट गया। इंजेक्शन लगवाने आया था। चिकित्सक ने बाहर से इंजेक्शन लिख दिया। यहां केंद्र पर इंजेक्शन है नहीं। केंद्र के खुलने का कोई लाभ नहीं मिल रहा। अब बाजार से ही अधिक पैसे देकर खरीदना पड़ेगा।
संजय
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दवाई कंपनी को 700 प्रकार की दवाओं के लिए डिमांड भेजे एक हफ्ते से ज्यादा हो गया, लेकिन अभी तक दवाएं नहीं आई हैं। कंपनी में जानकारी की तो चार-पांच दिन में दवा आने की कह रहे हैं। रोगियों को लौटाकर हमें खुद शर्म लगती है।
गिरीश कांत, केंद्र संचालक