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हरदोई: काला हांडी की याद दिलाता है शगुन का मासूम चेहरा

अमित यादव, अमर उजाला, हरदोई Published by: कुमार संभव Updated Tue, 12 Jan 2021 11:00 AM IST

सार

उम्र छह माह, वजन दो किलोग्राम, डॉक्टरों ने कहा नहीं बर्दाश्त कर पाएगी टीका
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया


हरदोई के संडीला ब्लॉक में बेगमगंज के पच्छे टोला की संकरी गलियों में श्रीकांत का घर है। वह तो घर पर नहीं मिला लेकिन छह माह की शगुन को उसकी दादी इमरती धोती के एक टुकड़े में लपेट कर बाहर ले आई। पता चला तेल लगाकर धूप में लिटाया था, इसलिए शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं है। जैसे ही शगुन के शरीर से धोती का टुकड़ा हटाया गया तो उसकी हालत देखकर उड़ीसा के कालाहांडी और भुखमरी से जूझ रहे अफ्रीकी देशों के कुपोषित बच्चों का चेहरा आंखों के सामने घूम गया। शगुन का चेहरा कुपोषण के कारण छोटा सा हो गया है। कमजोर इतनी की उसकी पसलियां गिनी जा सकती हैं। हाथ और पैर इतने पतले कि डॉक्टरों ने उसके टीकाकरण से मनाकर दिया है। जन्म से लेकर अभी तक उसका टीकाकरण नहीं हुआ है, क्योंकि डॉक्टरों का कहना है वह टीके को सहन नहीं कर पाएगी। शगुन की दादी इमरती बताती हैं कि वह चार महीने तक केजीएमयू ट्रॉमा सेंटर भर्ती रही। इसके बाद उसे घर लाया गया था। मां है नहीं बस जैसे-तैसे जिंदा है। 


बच्चों का वजन करने वाली मशीन खराब

जिले में कुपोषण से लड़ाई के लिए जरूरी संसाधनों का बुरा हाल है। अधिकतर आंगनबाड़ी के पास बच्चों का वजन करने की मशीन खराब है। वहीं कई मशीनें सिर्फ नई बैटरी न मिलने के कारण बेकार पड़ी हैं। आंगनबाड़ी बताती हैं कि जरूरत पड़ने पर एएनएम से मांगकर काम चलाती हैं। जब हम बेगमगंज-1 आंगनबाड़ी केंद्र पहुंचे तो वहां की प्रभारी उमा और उनकी सहायिका बच्चों और कई महिलाओं से घिरी हुई थीं। बच्चों के लिए आया गेहूं, चावल, चने की दाल और आयरन-फोलिक एसिड बांटा जा रहा था। वहीं पर पूजा देवी अपने चार साल के बेटे सौरभ के साथ राशन लेने आई थीं। पूछने पर बताया कि सौरभ का वजन कई महीने पहले हुआ था। अभी इसलिए नहीं हो पा रहा है क्योंकि मशीन खराब पड़ी है। इसी तरह सुमन अपनी एक साल की बेटी खुशबू को घर पर छोड़कर आई थी। खुशबू अतिकुपोषित श्रेणी में है। सुमन बताती है कि कुछ दिन पहले तक उसे बुखार था। सीएचसी से दवा ली और वापस आ गए लेकिन वह बच्चे को लेकर पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती करने के लिए वह तैयार नहीं है। काम धंधा कोई है नहीं, इसलिए वहां रहकर देखभाल करना सबसे बड़ी चुनौती है।


घर पर कराया प्रसव, जुड़वां बच्चों की मौत

इसी ब्लॉक के सराय मारूफपुर में एक परिवार मुकेश का है। उसकी एक साल की बेटी है शुभी। मुकेश और उसकी पत्नी घर पर नहीं थे। उसके पड़ोस के लोग बताते हैं कि मुकेश की पत्नी की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। वह आंगनबाड़ी से लेकर आशा तक से लड़ने-झगड़ने लगती हैं। इसलिए उसकी एक साल की बेटी को कोई भी टीका नहीं लगा है। वह अस्पताल भी नहीं जाती है। सितंबर में उसे जुड़वां बच्चे हुए थे। घर पर ही सास ने प्रसव कराया था। तीन दिन बात दोनों बच्चों की मौत हो गई। इसी गांव का एक परिवार अपनी कुपोषित बच्ची रिंकी को लेकर लापता है। आंगनबाड़ी सुषमा रानी अस्थाना और वहां के प्रधान बताते हैं कि रिंकी का पिता श्याम मजदूरी करता है। इसलिए शायद दिल्ली चला गया है। रिंकी कुपोषित होने के साथ ही पैदाइशी विकलांग भी है। उसको बीमारी कौन सी है किसी को नहीं मालूम। क्योंकि तीन साल चार महीने की रिंकी अभी उठ-बैठ भी नहीं पाती है।


सुना है घी बंटेगा, लेकिन अभी मिला नहीं

बच्चों को पोषण आहार के रूप में गेहूं, चावल, दाल के अलावा घी देने की योजना है। इस पर जिस भी आंगनबाड़ी से बात की गई तो उसने बताया कि सुना है घी बंटेगा, लेकिन अभी मिला नहीं है। कई कुपोषित बच्चों के परिवारीजनों ने बताया कि अनाज एक दो बार मिला है लेकिन घी अभी तक नहीं मिला। संडीला के सीडीपीओ राम भुवन वर्मा बताते हैं कि ४५० और ९०० ग्राम के पैकेट में घी आ गया है। जल्द ही उसे बंटवाया जाएगा। अब स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आहार और घी बंटवाने का आदेश है। जल्द ही इसकी शुरुआत की जाएगी।


आंकड़े एक नजर में
अति कुपोषित बच्चे 1052
कुपोषित बच्चे 4352
सामान्य बच्चे 339168

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