प्राकृतिक आपदाओं के जख्मों से कराहते किसानों पर लाचार सिस्टम भी किसी सितम से कम नहीं है। जिले के किसानों की हालत भी बुंदेलखंड के किसानों से कम बदहाल नहीं हैं। हाल यह है कि कई ब्लाकों में कल का किसान आज मजदूर बन गया है। खाद, बीज की किल्लत झेल चुके किसान सिंचाई के लिए हलाकान है। नहरें, माइनरें सूखी पड़ी हैं। ज्यादातर सरकारी नलकूप बंद पड़े हैं। फिलवक्त गेहूं किसान ज्यादा परेशान है। सिंचाई के अभाव में सैकड़ों बीघे गेहूं की फसल सूख रही है। साथ ही लाही, चना, मटर, जौ, अरहर का उत्पादन भी घटने का अंदेशा है। निजी ट्यूबवेल से सिंचाई करना भी सबके बूते में नहीं है। कुछेक बड़े काश्तकारों को छोड़कर छोटे किसान इतना पैसा भी खर्च नहीं कर सकते हैं। जिलाधिकारी, रमेश मिश्र का कहना है कि नहरों में पानी किन कारणों से नही पहुंच पा रहा है जानकारी लेकर कार्रवाई की जाएगी।
इस बार जनपद सूखे की चपेट में रहा है। रबी फसलों के शुरुआती सीजन में नहरों में पानी आ गया था। उस समय किसानों को पलेवा आदि करने के लिए पानी मिल गया था। इसके बाद मौसम प्रतिकूल हुआ। पर्याप्त ठंड न पड़ने के कारण गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचने की आशंका बढ़ गई है । अभी फरवरी माह ही चल रहा है, लेकिन तापमान बढ़ने के साथ ही गेहूं में सिंचाई की जरूरत पड़ने लगी है। मौजूदा समय में नहरें, माइनर सूखी पड़ी हुई हैं। सरकारी नलकूप भी विद्युत और यांत्रिक दोष के कारण बंद हैं। किसानों ने बताया कि निजी साधनों से सिंचाई करना किसानों के लिए काफी महंगा साबित हो रहा है। कई किसान अभी भी नहरों में पानी आने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
कभी सूखा तो कभी अतिवृष्टि ने दिए जख्म
वर्ष 2014 में भी सूखे की मार से किसान आर्थिक संकटों एवं कर्ज के जख्मों से कराह रहे थे तो वर्ष 2015 में रबी की फसलों में अतिवृष्टि से कृषि की बर्बादी हुई। अतिवृष्टि ने किसानों की रबी की फसलों को बर्बाद कर दिया था। कहीं कम नुकसान हुआ था तो कहीं 100 प्रतिशत नुकसान हुआ था । प्रशासन के सर्वे को ही आधार माने तो 5 लाख से अधिक किसान फसली नुकसान से प्रभावित हुए थे और तकरीबन 2 अरब 27 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ था। इसके बाद खरीफ की फसलों में भी माह बार अगर बारिश पर नजर डाली जाए तो कभी बारिश ज्यादा हुई तो कभी लिहाजा खरीफ की फसलें भी 20 से 50 फीसदी प्रभावित हुई हालांकि 50 फीसदी का औसत न मिलने से सूखाग्र्रस्त जिला घोषित न हो सका जिसके चलते किसानों का सहायता न मिल सकी ।
कमीशन के खेल में सिंचाई व्यवस्था फेल
नहरों एवं रजबहों की सफाई कराकर टेल तक पानी पहुंचाने के साथ ही नहरों एवं रजवहों से निकाले गए कुलाबों एवं गूलों के माध्यम से खेताें को पानी देने की मंशा और किसानों के हक पर कमीशन का खेल भारी पड़ जाता है। करोड़ों रुपये खर्च कर आंकड़ों की बाजीगरी कर कागजों में खेतों को नहरों एवं नलकूपों से मुफ्त में सिंचाई का पानी मिल रहा है मगर जमीनी हकीकत उलट है। चार जिलों में उलझी नहरों एवं रजवहों की व्यवस्था पर कारीगरों के कमीशन का जाल है। जिससे कारीगर तो मालामाल हो रहे और किसानों को निजी संसाधनों से सिंचाईं पर भारी भरकम पैसा खर्च कर किसान कंगाल हो रहे है -
यह है सिंचाई की व्यवस्था
शारदा नहर की जिले में 205 नहरें एवं रजबहे है। नहरों एवं रजवहों की कुल लंबाई करीब 1644 किलोमीटर है। इनकेरखरखाव एवं सिंचाई प्रबंधन की जिम्मेदारी हरदोई स्थित शारदा नहर खंड एवं राष्ट्रीय जल प्रबंध खंड के अलावा उन्नाव स्थित राष्ट्रीय जल प्रबंध और लखनऊ स्थित शारदा नहर खंड एवं शाहजहांपुर स्थित शारदानहर एवं जल प्रबंध डिवीजनों पर है । 80 फीसदी नहरें एवं रजबहें शारदानहर एवं राष्ट्रीय जल प्रबंध डिवीजन हरदोई के अंतर्गत है। इसके अलावा 5 सौ से अधिक राजकीय नलकूप हैं।
नहरों की सफाई और नलकूपों के निर्माण में गोलमाल
शासन द्वारा नहरों की सफाई के लिए दिए गए करोड़ों रुपये गोलमाल हो गए या फिर आंकडों की बाजीगरी की भेंट चढ़ गए। इसी तरह से नलकूपों की पुर्नस्थापना के लिए दो सौ करोड़ की धनराशि में खेल हो गया। खेल करने वालों के आलीशान बंगले तो बन गए मगर खेतों को पानी न मिल सका ।
सफाई को लेकर हो चुकी अनबन
जिस समय खेतों को पानी की जरूरत है तब नहरों की सफाई कराई जा रही है। सफाई कार्य करीब डेढ़ माह पूर्व ही हो जाना चाहिए था मगर करीब 1 करोड़ से होने वाले सफाई कार्य को लेकर तत्कालीन एक्सईएन एवं जिले के एक अफसर के बीच अनबन के चलते कार्य न हो सका। दस दिन पूर्व एक्सईएन का तबादला हो गया ।
खेतों की प्यास अब भी महज आस !
1970 के दशक में जिले में सवायजपुर रजवहा, बरवन रजवहा का निर्माण कई करोड़ रुपये से कराया गया था मगर इसे किसानों का दुर्भाग्य कहा जाए या फिर जिम्मेदारों की उदासीनता कि इन रजबहों से किसानों को अभी तक सिंचाई के लिए पानी नहीं मिल सका है। उधर, कछौना तथा बघौली, बेंहदर सूखे रजबहे तथा भरखनी, मल्लावां व माधौगंज, हरपालपुर में बंद पड़े नलकूप सरकारी व्यवस्थाओं की पोल खोल रहे है।
पाली क्षेत्र के किसान उमेश मिश्रा कहते है कि सरकारी सिंचाई व्यवस्था छलावा है। क्षेत्र में नलकूप खराब है नहरे सूखी है । नारायण प्रसाद ने कहा कि किसान तो मजबूर और लाचार है कहीं कुदरत की मार तो कहीं सरकारी व्यवस्थाएं लाचार है जिससे किसानों को हमेशा परेशान रहना पड़ता है। लंकुश कहते है कि कुदरत पर तो कोई जोर नहीं है मगर सरकारी व्यवस्था के जिम्मेदारों पर तो अंकुश होना चाहिए ताकि खेतों को पानी मिल सके । मुलायम ने कहा कि मुफ्त सिंचाई का कोई मतलब नहीं रह गया है जब सिंचाई के लिए पानी ही नहीं मिल पा रहा है तो मुफ्त का सवाल कहां रह गया है ।