लखीमपुर खीरी स्थित दुधवा नेशनल पार्क से जंगल के खूंखार जानवरों का घनी आबादी में आना खतरनाक होता जा रहा है। दो दशक में करीब 13वीं बार क्षेत्र में जंगली जानवर या तेंदुआ आ गया। इसके घुसने से जिले में दहशत फैल गई है। वहीं वन विभाग की सतर्कता के दावों की पोल खुल रही है। लगातार इन जानवरों के आने के बावजूद महकमेे में संसाधनों का टोटा है। पूछे जाने पर विभागीय अधिकारी बोले कि जरूरत पड़ने पर लखनऊ अथवा उन्नाव से संसाधनों का इंतजाम करना पड़ता है।
वन विभाग के सूत्रों की मानें तो दो दशक पहले वर्ष 2002 में पिहानी थाना क्षेत्र में एक बाघ घुस आया था। उसने क्षेत्र के महमूदपुर भगत निवासी किसान सुमेर (65) पर हमला बोलकर मौत के घाट उतार दिया था। इसके अलावा कई ग्रामीणों को भी घायल किया था। तत्कालीन वन विभाग के अफसरों की मशक्कत के बावजूद बाघ पकड़ में नहीं आया। 24 अप्रैल 2002 को महमूदपुर भगत और मढ़िया गांव के बीच ग्रामीणों ने बाघ को देखते ही गोलियां बरसाकर उसे मार गिराया था। वर्ष 2006 के मई माह में सांडी ब्लॉक क्षेत्र में तेंदुए ने कहर बरपाया।
उसने करीब एक दर्जन ग्रामीणों को लहूलुहान कर दिया था। वन विभाग के अधिकारियों की मशक्कत के बावजूद उनके लगाए पिंजड़े में न फंसकर ट्यूबवेल की बोरिंग के लिए खोदे गए करीब 15 फिट गहरे गड्ढे में 16 मई को गिर गया था। तब विभाग की टीम ने उसे बेहोश कर काबू में किया। अक्टूबर 2010 में भी लोनार क्षेत्र में आए एक बाघ ने वन विभाग की टीम को खूब छकाया। लखनऊ और उन्नाव से जाल और हाथी मंगवाकर कांबिंग की गई। लेकिन नतीजा सिफर रहा। वह बाघ फर्रुखाबाद जिले के नवाबगंज क्षेत्र में पकड़ा गया। इसके बाद टड़ियावां और अतरौली क्षेत्र में जनवरी 2012 में एक तेंदुए ने खूब छकाया।
कई ग्रामीण उसके हमले में जख्मी हुए थे। हरदोई और लखनऊ टीम उसे पकड़ने पहुंची लेकिन तेंदुआ लखनऊ के काकोरी क्षेत्र में पहुंच गया। तब जाकर करीब 80 दिन बाद पकड़ा जा सका। इसके बाद 10 जनवरी वर्ष 2013 को सुरसा थाना क्षेत्र के हरदोई-लखनऊ मार्ग स्थित गांव कराही के पास गुरुवार की सुबह करीब 4 बजे सड़क पार कर रहा एक तेंदुआ किसी अज्ञात हैवी वाहन की चपेट में आने से उसका जबड़ा कुचल गया। इससे उसकी मौत हो गई। वन विभाग की टीम ने तेंदुए की लंबाई नापी जिसमें करीब 6.5 फिट लंबा व करीब 3 साल का युवा नर तेंदुआ निकला।
वन विभाग के अधिकारी तेंदुए के शव को लेकर कोयल बाग कालोनी स्थित कार्यालय पहुंचे और वहां उसका अंतिम संस्कार कराया। इसी क्रम में अगस्त 2016 को बिलग्राम के परसोला गांव में जंगली जानवर ने मवेशियों को अपना शिकार बनाया। हालांकि वन विभाग ने उसे तेंदुआ नहीं माना लेकिन बिलग्राम से लेकर छिबरामऊ व कटरी क्षेत्रों में उसकी दहशत महीनों रही।
इसके बाद 2017 में अप्रैल में हरदोई वन रेंज में बेहटागोकुल का पिपरी और फिर 15 दिन बाद ही शाहाबाद की गढ़ीचांद में तेंदुए ने दहशत फैलाई। इसके बाद अब फिर शहर की ओर आ पहुंचा। एक वर्ष पूर्व भी एक बाघ के जिले में होने की दहशत थी लेकिन वह भी लखीमपुर की ओर निकल गया था। अभी तीन दिन पूर्व सांडी के ग्राम बघराई में तेंदुआ देखे जाने की आहट हुई थी लेकिन वन विभाग के रेंजर ने तेंदुआ होने की बात से भले इंकार कर दिया था लेकिन लोगों में इसको लेकर दहशत बरकरार थी।
तेंदुए के विषय में यह भी जाने
. चालाक, मौकापरस्त व फुर्तीला रात्रिचर प्राणी
. छोटे वन्य जीवों व पालतू पशुओं का शिकार करता है
. अपने शिकार को मुंह में दबा पेड़ पर चढ़ने की क्षमता
. उसकी दृष्टि व सुनने की क्षमता बहुत तेज
. नर तेंदुआ की लंबाई 2.15 मीटर तक हो सकती
. जबकि मादाएं 1.85 मीटर लंबी तक हो सकती
. नर तेंदुए का वजन 70 किलो तक
. मादा तेंदुए का वजन 50 किलो तक
. तेंदुए लाल भूरे रंग का होता
.तेंदुए की आयु 12-16 साल होती
. झाड़ियों, पेड़ों पर यहां तक की वक्त की नजाकत को समझ मनुष्य की आबादी वाले क्षेत्रों में भी खुद को छिपाने में समर्थ।
तेंदुए को देख आसमान में मंडराने लगते हैं, चील, कौवे
हरदोई। वाइल्ड लाइव के विशेषज्ञों का कहना है कि खेतों या जंगल में कहीं भी तेंदुआ या इस नस्ल का कोई जानवर होता है तो आसमान में चीलें या कौए मंडराने लगते हैं।