नई बस्ती में चपरतला रोड के पास मैदान में शनिवार की रात को नातिया मुशायरा हुआ। इस मौके पर शायरों ने कलाम पेशकर श्रोताओं की वाहवाही लूटी। शायरों ने पैगंबर और सबाहा की शान में कलाम पेश किए। मस्जिद फारूके आज़म के नायब इमाम मौलाना सगीर कासमी ने नातिया मुशायरे पर प्रकाश डाला।
मुशायरे का आगाज़ तिलावते कुरान से हुआ। वसीम रामपुरी ने यह कलाम मेरा दिल और मेरी जान मदीने वाले, आप की ज़ात पे कुरबान मदीने वाले पेश किया। अशफाक बहराइची ने असहाबे- मोहम्मद से मोहब्बत है लाज़मी, इनकार गर करोगे, जहन्नुम में जाओगे, कलाम पेशकर वाहवाही लूटी।
कलीम तारिक ने यह कलाम, नमाज़ो की लज्ज़त, नमाज़ों की बरकत, कभी तुम इबादत गुज़ारों से पूछो, पेश किया। मुजम्मिल हयात ने आखिरत में रसूल की सिफारिश के यकीन को शायरी बनाकर यह कलाम सुनाया- उम्मती आपका हो और जहन्नुम में जले, मेरे सरकार को हरगिज़ न गवारा होगा,।
ताबिश रेहान ने सूखे थनों में आए न क्यों दूध का उबाल, अल्लाह का हबीब हलीमा के घर में है, कलाम पेश किया। संचालन कर रहे अकरम जलालपुरी ने यह कलाम पेश किया, हलीमा सारे आलम में अजब तेरा मुकद्दर है, तेरी आगोश में खेले पयंबर का पयंबर है।
अशफाक बहराइची का कलाम आ गए हबीबे किबरिया, साहिबे जमाल आ गए, कायनात जगमगा उठी, आमिना के लाल आ गए, भी पसंद किया गया। फारूक दिलकश का यह शेर -हज़ारों मुस्तफा के चाहने वाले हैं लेकिन, बिलाले मुस्तफा का रंगे उल्फत और ही है, भी पसंद किया गया।
इसके अलावा शकील मुबारकपुरी, शादाब सरल, अंजुम बारवंकवी व हैरत पिहानवी ने भी सुनाएं। मुख्य अतिथि मोहम्मद शकील धुन्नन ने शायरों की हौसलाअफज़ाई की। संयोजक चांद खां ने आभार जताया।