खाद्य एवं औषधि प्रशासन द्वारा मिलावटी खाद्य
पदार्थों के लिए समय-समय पर चलाए गए अभियान का जिले भर में चल रही दूध
डेरियों पर कोई खासा प्रभाव देखने को नहीं मिल पा रहा है। जिसका मुख्य कारण
है कि जिम्मेदार सुविधा शुल्क लेकर उन्हें अभयदान देते आ रहे हैं और जांच
कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूरी की जा रही है, जिस पर लोगों ने अंगुली
उठाई है।
शहर और जिले के आसपास क्षेत्र में एक दर्जन से अधिक दूध
डेरियां चल रही हैं। इनमें से क ई लोगों के पास एन तो लाइसेंस और न ही
मानकों के अनुरूप कार्यप्रणाली है। सूत्रों की माने तो उपभोक्ता तक
पहुंचाया जाता है। गौर करने की बात यह है कि लोगों को मीठा जहर खिलाकर मोटी
कमाई करने का धंधा तेज गति से चल रहा है।
जिम्मेदार विभागों की जानकारी
में सब कुछ होने के बावजूद वर्षों से सिंथेटिक दूध बनाने वाले डेरियों के
खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई। बताया गया कि नकली दूध बनाने के
लिए डेरियों पर व्यवसायी रिफाइंड आयल, टूथपेस्ट, यूरिया और वाशिंग पाउडर
इत्यादि का प्रयोग डेरियों पर किया जाता है।
यह डेरियां कुछ दूध का संग्रह
भी करती हैं। मुनाफे के लिए मौके पर ही उससे क्रीम निकालकर सप्रेटा दूध
को दोबारा खपाने के लिए उसमें पेंट और रसायन की मिलावट की जाती है, जिससे
वह शुद्ध और गाढ़ा दूध नजर आने लगता है। इस दूध की बाजार में आसानी से खपत
हो जाती है।
शहरवासियों का कहना है कि लाख श्वेत क्रांति लाने का प्रयास
किया जाए, पर दूध में मिलावट का गोरखधंधा बंद नहीं हो रहा है। शहर के
मुनेंद्र, मुस्ताक, श्याम मिश्र आदि ने जिलाधिकारी से अभियान को तेज करके
इस मिलावटी दूध पर अंकुश लगाए जाने की मांग की है।
उधर, इस बाबत जिला खाद्य
सुरक्षा अधिकारी धर्मराज मिश्रा ने बताया कि समय-समय पर अभियान चलाकर
नमूने लिए जाते हैं, जल्द ही अभियान चलाकर नमूने लेकर परीक्षण के भेजेंगे।
उन्होंने कहा कि फेल होने वाले नमूनों के लिए मुकदमे दर्ज कराए जाते
हैं।