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फोटो- 13- आईसीयू में कुछ इस तरह भर्ती मरीज। संवाद
- 50 लाख की आबादी वाले जिले में सिर्फ 10 बेड का आईसीयू, दो वेंटिलेटर शोपीस, मरीज कर देते रेफर
- मेडिकल कॉलेज का हाल-पाइप लाइन बिछी होने के बाद भी ऑक्सीजन प्लांट भी प्रेशर न होने से काम नहीं कर रहा,
अनुपम कीर्ति भारद्वाज
हरदोई। बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं के सरकारी दावे धरातल पर कुछ और ही नजर आते हैं। सस्ते इलाज के लिए लोग मेडिकल कॉलेज आते हैं लेकिन यहां सबसे जरूरी सेवाओं में से एक इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) को खुद ही सांसों की दरकार है। तकरीबन 50 लाख की आबादी वाले जिले में महज 10 बेड का आईसीयू है। हैरत की बात यह है कि आईसीयू भी ऐसा जिसमें वेंटिलेटर तक का इंतजाम नहीं है।
मेडिकल कॉलेज की स्थापना के समय से ही लोगों को स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर होने की उम्मीद होने लगी थी। उम्मीद कुछ हद तक पूरी भी हुई लेकिन ज्यादातर उम्मीदें आशंकाओं में बदल गईं। वजह यह कि गंभीर मरीजों को ले जाने पर यहां रेफर का इलाज होता है। मेडिकल कॉलेज में आईसीयू है लेकिन इसमें वेंटिलेटर हैं ही नहीं। वेंटिलेटर होते भी तो क्या होता क्योंकि चलाने वाला तो कोई है नहीं। आकस्मिक निरीक्षण पर आने वाले अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को दिखाने के लिए दो वेंटिलेटर लगे हैं, लेकिन इनकी अहमियत सिर्फ शोकेस में रखे जाने वाले उपकरणों जैसी है।
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वार्डों में सिलिंडर से ही दी जाती ऑक्सीजन
कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान पीएम केयर फंड से लेकर निजी क्षेत्र की कंपनियों तक से सहयोग लेकर मेडिकल कॉलेज परिसर में ऑक्सीजन प्लांट लगवाए गए। वेंटिलेटर चलाने के लिए भरपूर प्रेशर वाली ऑक्सीजन चाहिए होती है लेकिन प्लांट भी इतनी ऑक्सीजन न दे पाए कि वेंटिलेटर चल पाते। दरअसल हकीकत यह भी है कि आईसीयू में ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए प्लांट से पाइप लाइन पड़ी है लेकिन यहां के मरीजों को जरूरत पड़ने पर कंसंट्रेटर और सिलिंडर से ही ऑक्सीजन दी जाती है।
जब वेंटिलेटर थे तो टेक्नीशियन नहीं थे
मल्लावां क्षेत्र में एक ईंट भट्ठे पर काम करने वाली सुखवारा अब भले ही किसी के जेहन में न हो लेकिन उसकी मौत ने सिस्टम पर जो सवाल खड़े किए थे उनके जवाब अब भी दूर हैं। सुखवारा की हालत बिगड़ी थी। उसे मेडिकल कॉलेज लाया गया था। चिकित्सकों ने वेंटिलेटर की जरूरत बताते हुए लखनऊ मेडिकल कॉलेज रेफर कर दिया था। लखनऊ मेडिकल कॉलेज में भी उसे वेंटिलेटर नहीं मिल पाया था और फिर जब लोहिया संस्थान में वेंटिलेटर मिला तब तक सुखवारा की सांसें टूट चुकी थीं। हरदोई मेडिकल कॉलेज में तब वेंटिलेटर तो थे लेकिन चलाने वाला कोई नहीं था।
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पवन को मिल जाता वेंटिलेटर तो शायद बच जाते
शहर के रेलवेगंज निवासी पवन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था। अपने घर में वह सुबह के समय दाढ़ी बना रहे थे। अचानक बेहोश होकर गिर पड़े। परिजन उन्हें मेडिकल कॉलेज लाए। यहां चिकित्सकों ने उन्हें वेंटिलेटर की जरूरत बताई। लखनऊ मेडिकल कॉलेज रेफर किए जाने की तैयारियों के बीच उन्होंने दम तोड़ दिया।
इन मरीजों को होती है वेंटिलेटर की जरूरत
मेडिकल कॉलेज के डॉ. अमित आनंद ने बताया कि जिन मरीजों का ऑक्सीजन लेवल 60 के नीचे चला जाता है उन्हें वेंटिलेटर पर लेना चाहिए। सांप काटने वाले मरीज को अगर सांस लेने में दिक्कत तो उसे भी वेंटिलेटर पर रखकर उपचार देना चाहिए। इसके अलावा सांस रोग से पीड़ित मरीज, सिर में गंभीर चोट से घायल मरीजों और हृदय रोगियों को भी वेंटिलेटर पर रखने की जरूरत पड़ जाती है।
हर माह औसतन 250 से अधिक मरीज हो जाते रेफर
मेडिकल कॉलेज में बेहतर संसाधन न होने की वजह से गंभीर मरीजों को यहां इलाज नहीं मिल पाता है। इमरजेंसी में दुर्घटना और जलने के अलावा गंभीर रोगियों को सिर्फ प्राथमिक उपचार ही मिल पाता है। जबकि हर माह करीब 250 से अधिक मरीजों को रेफर कर दिया जाता है। दुर्घटना में घायलों को तो आईसीयू में भर्ती ही नहीं किया जाता हैं वहीं जो गंभीर रोगों से पीड़ित होते हैं उन्हें ही उपचार मिलता है। बीते माह में भर्ती हुए करीब 161 मरीजों में से करीब 68 को हायर सेंटर रेफर किया गया है।
आईसीयू में यह होनी चाहिए सुविधाएं
वेंटीलेटर आईसीयू की सबसे प्रमुख जरुरत है। वेंटीलेटर के बिना आईसीयू महत्वहीन है। इसके अलावा मल्टीपारा मॉनीटर, डिफिब्रिलेटर जिसे अनियमित दिल की धड़कन का पता लगाने के प्रयोग किया जाता है, इंफ्यूजन और सिरिंज पंप समेत कई प्रकार की संक्रमण रहित सावधानियों का भी ध्यान रखना पड़ता है।
वर्जन
आईसीयू को वेंटिलेटर से लैस करने की प्रक्रिया चल रही है। इन्हें चलाने के लिए एनेस्थेटिस्ट, मेडिसिन और सर्जरी विशेषज्ञ चिकित्सकों प्रशिक्षण दिया जा चुका है। जल्द ही मेडिकल कॉलेज में मरीजों को वेंटिलेटर की सुविधा मिलने लगेगी।-डॉ. जेबी गोगोई, प्रधानाचार्य