हरदोई। अजीब बात है, नवरात्र के बाद विजय दशमी पर यहां (जिला मुख्यालय पर) न तो रावण वध लीला होती है और न ही रावण के पुतले का दहन होता है।
कस्बों में श्रीराम लीला और विजय दशमी पर रावण वध लीला और रावण के पुतलों का दहन होता है। यहां पर जनवरी में नुमाइश शुरू होती है और उसी के साथ श्रीराम लीला का मंचन होता है। होली के त्योहार से एक सप्ताह पहले नुमाइश मैदान में कलाकार श्रीराम लीला मंचन में रावण का वध करते हैं और रावण, मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन किया जाता है।
नुमाइश मेला ऐतिहासिक है। साल 1906 में अंग्रेजी हुकूमत में डिस्ट्रिक्ट कलक्टर रहे एओ ह्यूम ने अब के नुमाइश मैदान में फ्लावर डेकोरेशन के नाम से प्रदर्शनी की नींव रखी थी। कुछ साल तक फ्लावर डेकोरेशन प्रदर्शनी लगती रही करीब पांच-छह साल बाद से ही श्रीराम लीला का मंचन शुरू हो गया। समय के साथ कलक्टर बदलते रहे। स्वतंत्रता सेनानी वरिष्ठ पत्रकार रहे स्व. हरिबहादुर श्रीवास्तव ने साल 1930 में फ्लावर डेकोरेशन प्रदर्शनी को श्रीराम लीला मेला प्रदर्शनी कमेटी का गठन किया। उन्होंने श्रीराम लीला को गति दी और समाज के लोगों को आयोजन से जोड़ा।
श्रीराम लीला मेला प्रदर्शनी कमेटी के महासचिव नगर पालिका के पूर्व अध्यक्ष रामप्रकाश शुक्ला ने बताया कि बाबू हरीबहादुर श्रीवास्तव के निधन के बाद से श्रीराम लीला आयोजन की व्यवस्था संभाल रहे हैं। बताया कि 20-26 जनवरी के मध्य नुमाइश मेले के लिए श्रीगणेश पूजन होता है। उसी के साथ दिन में श्रीराम लीला और रात में रासलीला का मंचन होता है। साथ ही सांस्कृतिक कार्यक्रम, कवि सम्मेलन, मुशायरा होता है। खादी वस्त्रों की प्रदर्शनी लगती है। होली से करीब सप्ताह भर पहले रावण वध लीला का मंचन और पुतला दहन होता है।
रावण वध के पाप मुक्ति के लिए जिले में आए थे प्रभु श्रीराम
माता सीता के हरण के कारण प्रभु श्रीराम ने लंकाधिपति रावण से युद्ध किया। प्रभु श्रीराम की सेना ने रावण के योद्धाओं को एक-एक कर मौत की नींद सुला दिया। तब प्रभु श्रीराम ने रावण का वध किया था। श्रीराम चरित मानस और अन्य ग्रंथों में ऐसा प्रसंग मिलता है कि रावण वध के बाद प्रभु श्रीराम माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ अयोध्या आए। हत्याहरण तीर्थ के श्रीराम-जानकी मंदिर के पुजारी पं. बृजकिशोर उर्फ चौबेजी महाराज ने बताया कि धार्मिक ग्रंथ में ऐसा प्रसंग मिलता है कि अयोध्या आने पर प्रभु श्रीराम ने यज्ञ-अनुष्ठान कराना चाहा तो आचार्यों और गायों ने ब्रह्म हत्या का दोष बताकर मना कर दिया था।
प्रभु श्रीराम ने गुरु वशिष्ठ से कहा कि युद्ध में ऐसा नहीं होता है। तब गुरु वशिष्ठ ने भगवान श्रीराम से दाहिनी हथेली में स्यामल बाल होने की बात कही थी और कहा कि लखेऊ हाथ जब स्याही बारा, तब रघुमंत मणिन विचारा। गुरु वशिष्ठ की सलाह पर माता सीता, भ्राता लक्ष्मण के साथ प्रभु श्रीराम हत्याहरण सरोवर में स्नान के लिए आए थे। बताया कि हिंदू धर्म ग्रंथ में जिसका उल्लेख फाल्गुन शुक्ल तीज रविवारा, आवत भए अवधेश कुमारा.. से मिलता है।