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आओ यह मोहब्बत है, इसे दोनों निभाएं...

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कलाम पेश करते प्रोफेसर वसीम बरेलवी। संवाद - फोटो : HARDOI
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हरदोई। आओ यह मोहब्बत है, इसे दोनों निभाएं, एक दिल में समा जाए, यह वो राज नहीं है...। प्रोफेसर वसीम बरेलवी ने गुरुवार रात मुशायरे में यह कलाम पढ़ा तो चाहने वालों ने तालियों से उनका इस्तकबाल किया। श्रीरामलीला मेला एवं प्रदर्शनी कमेटी की ओर से आयोजित मुशायरे में अलग अलग शहरों से आए ख्यातिलब्ध शायरों ने अपने कलाम पेश कि।
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दिल्ली से आए इकबाल अशहर ने पढ़ा यही जुनून यही एक ख्वाब मेरा है, वहां चराग जला दूं जहां अंधेरा है...। मोहम्मद अली शाहिल ने पढ़ा - चराग बन के लड़ा हूं मैं जब अंधेरों से, कदम कदम पे हवाओं ने दम बढ़ाया है...। ताहिर फराज ने पढ़ा - मुझको अफसोस अगर है तो यही है ताहिर, मेरी मां ने नहीं देखा ये जमाना मेरा...। बिलाल सहारनपुरी ने पढ़ा- मैं अपने घर के उस कमरे को हिंदुस्तां कहता हूं, जहां गीता के बिल्कुल पास में कुरआन रखा है...। कलीमसमर ने पढ़ा कि - सिर्फ अपनों की मेहरबानी से, दूर होना पड़ा कहानी से, कोई अपना नहीं सियासत में, हमने सीखा है आडवानी से...। हसीब सरोज ने पढ़ा - बड़ा मुश्किल सबक है, कब किसी को याद होता है, मोहब्बत जो निभाता है, वही बरबाद होता है...। मुशायरे का संचालन कर रहे नदीम फारुख ने पढ़ा - बहुत मगरूर हैं पागल हवाएं, चलो इनका हुनर भी आजमाएं, हमें अब तीरुगी रास आ गई हैं, कहां तक चांद के नखरे उठाएं...। कार्यक्रम के आयोजक राम प्रकाश शुक्ला ने आभार जताया।
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