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तब तक न रुको, जब तक लक्ष्य न मिल जाए

Sun, 11 Jan 2015 11:42 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, हरदोई
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विवेक यानी बुद्धि और आनंद यानी खुशियां। इन्हीं दो शब्दों से मिलकर बना है शब्द विवेकानंद। शायद तभी यदि भारतीय नवजागरण के अग्रदूत महान दार्शनिक व युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद को कहा जाए तो अतिशयोक्ति न होगी। सोमवार को स्वामी विवेकानंद की जयंती धूमधाम से मनाने को लेकर दिन भर तैयारियों का दौर रहा, वहीं बुद्धिजीवियों की जुबान पर उनके कृतित्व व व्यक्तित्व को लेकर चर्चाएं होती रही।
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विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णय के अनुसार वर्ष 1985 को अंतर्राष्ट्रीय युवा वर्ष के रूप में घोषित किया गया था। भारत में भी राष्ट्रीय युवा दिवस स्वामी विवेकानंद के जन्मदिवस 12 जनवरी को लेकर वर्ष 1985 से मनाया जाने लगा है। जिले में भी इसे बड़ी धूमधाम से मनाया जाता रहा है।

इस बार भी इसको मनाए जाने को लेकर तैयारियां जोरों पर हैं। स्वामी विवेकानंद की 150वीं जयंती 12 जनवरी 14 को जिलेवासियों ने धूमधाम से मनाई थी। एक दूसरे का हाथ थामकर एकता का प्रण लिया था, वहीं मानव श्रृखला में बच्चे से लेकर बूढ़े, नौजवान और महिलाओं ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया और लोगों को देश रक्षा का संकल्प लेने तथा लक्ष्य प्राप्ति की ओर प्रेरित किया था।
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सार्धसती समारोह आयोजन समिति की पहल पर शहर में कई स्थानों पर मानव श्रंखला बनाकर और स्वामी जी के आदर्शों व विचारों को आत्मसात करने का वचन लिया गया था। शहर के प्रमुख 12 स्थान बड़ा चौराहा, सिनेमा रोड, जिंदपीर चौराहा, नुमाइश चौराहा व रेलवेगंज में मानव श्रृंखला बनाई।

जिसमें स्कूलों की छात्र छात्राओं समेत अभिभावक, व्यापारी, बुजुर्ग और पुरुष-महिलाओं ने एक दूसरे का हाथ थाम कर स्वामी विवेकानंद जी के प्रेरक संदेशों को आत्म सात करने का वचन लिया गया था। इस बार भी तैयारियों का दौर जारी है। कई संस्थाओं व शैक्षणिक संस्थाआें के द्वारा स्वामी विवेकानंद की जयंती धूमधाम से मनाई जाएगी।

युवाओं के प्रेरणास्रोत व महान दार्शनिक स्वामी विवेकानंद ने अपने 39 वर्ष के संक्षिप्त जीवन काल में ऐसा कुछ पूरे विश्व को दे दिया जो वास्तव में इतिहास बन गया। बुद्धिजीवियों की माने तो युवाओं को दिए गए उनके द्वारा मंत्र उठो जागो और तब तक न रुको जब तक अपने लक्ष्य को न प्राप्त कर लो...। बुद्धिजीवियों का कहना है कि युवा जागरूक होकर यदि इसी मंत्र को अपने जीवन में उतार ले तो शायद अपने भविष्य से वह कभी निराश न हो।

उधर, वर्ष 1893 में शिकागो में हुए विश्व धर्म परिषद में भारत का प्रतिनिधित्व करने पहुंचे स्वामी विवेकानंद ने अपने 20 मिनट से अधिक के संबोधन में सिद्ध कर दिया कि हिंदू धर्म भी श्रेष्ठ है और इस धर्म में सभी अन्य धर्मों को समाहित करने की क्षमता विद्यमान है।
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