अधिकारियों सहित संस्थाओं व मान्यताओं को अपने
कर्तव्यों का निष्पक्षतापूर्वक निर्वहन करना चाहिए, जिससे लोकतांत्रिक
मर्यादाओं को कोई क्षति न पहुंचे। मूलचंद्र मिश्र स्मृति संस्थान तथा
भगवान परशुराम प्रेरणा ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को आपातकाल
के 40वें वर्ष पर श्रीराम बाजपेई स्मारक विद्यालय परिसर में
तानाशाही-लोकतंत्र और मीडिया विषयक गोष्ठी में उक्त बातें वक्ताओं ने कहीं।
विचार गोष्ठी में मौजूद लोगों ने 25 जून 1975 को भारतीय लोकतंत्र के
इतिहास का काला अध्याय बताते हुए वर्तमान में लोकतांत्रिक प्रवृत्तियों को
क्षति पहुंचाने वाले और सत्ता का दुरुपयोग कर लोकतंत्र का क्षरण करने वाले
व्यक्तियों व संस्थाओं के प्रति सचेत रहकर संघर्ष का संकल्प लिया।
गोष्ठी
का प्रारंभ स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर भोला सिंह, पूर्व विधायक सुरेंद्र
दुबे, योग समिति अध्यक्ष हरिवंश सिंह, सर्वोदय आश्रम अध्यक्ष उर्मिला
श्रीवास्तव, अधिवक्ता संघ अध्यक्ष रामेश्वर बाजपेई, अरुण मिश्र द्वारा
सामूहिक रूप से किया गया। गोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रोफेसर अखिलेश
बाजपेई ने कहा कि लोकतंत्र के उत्तरोत्तर विकास एवं उसकी मजबूती में मीडिया
की अहम भूमिका है।
उन्होंने विश्व के कई देशों, वहां की परिस्थितियों तथा
नेतृत्वकर्ताओं के उदाहरण देते हुए भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था को सबसे
बेहतर बताते हुए सचेत किया कि सत्ता स्वार्थी तत्वों से लोकतांत्रिक
संस्थाओं व मान्यताओं को बचाना जरूरी है।
ग्रामीण पत्रकार एसोसिएशन अध्यक्ष
अतुल कपूर ने कहा कि सच को सामने लाना मीडिया का पत्रकारिता धर्म है।
पूर्व विधायक सुरेंद्र दुबे ने 40 साल पहले लगी इमरजेंसी की प्रताड़ना एवं
पाबंदी के संस्मरण सुनाकर लोगों को रोमांचित किया। सर्वोदय आश्रम अध्यक्ष
उर्मिला श्रीवास्तव ने कहा कि जब आम जनता का विकास हो और उसके लिए वह
भयमुक्त वातावरण महसूस करे, तभी सच्चा लोकतंत्र है।
पूर्व प्राचार्य डा.
बीडी शुक्ल, सपा नेता पारुल दीक्षित, पूर्व विधायक खालिद गौरी, वरिष्ठ
पत्रकार शीतला बक्श सिंह ने भी विचार रखे। अतिथियों का स्वागत ट्रस्टी
समाजसेवी अरुणेश बाजपेई ने किया। महेश मिश्र, अवनिकांत बाजपेई आदि मौजूद
थे।