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गांव हों या शहर, नसों में घुल रहा जहर

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हरदोई। 40 लाख से अधिक आबादी वाले जिले में पिछले 10 साल में दूध का व्यापार सबसे ज्यादा बढ़ा है।
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दूध और दुग्ध उत्पादों की बढ़ती डिमांड के बीच दूध का व्यापार इस कदर बढ़ा कि जिले के बाहर भी आपूर्ति बड़े पैमाने पर हो रही, जबकि दूध उत्पादन एवं खपत के अनुमानित आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो बात साफ हो जाती है कि उत्पादन की अपेक्षा लगभग दो गुना खपत है।
ऐसे में खपत के सापेक्ष मांग को पूरा करने के लिए मिलावट का खेल जोर पकड़ रहा है। आम जनमानस के स्वास्थ्य के साथ हो रहे इस खेल का खुलासा खाद्य सुरक्षा विभाग के आंकड़े कर रहे हैं।
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विभागीय अफसर मानते हैं कि सैंपलों में औसतन हर दूसरा सैंपल फेल हो जाता है। मतलब साफ है कि मिलावट का काला कारोबार करने वाले जमकर जिले में काली कमाई कर लोगों के बीच मीठा जहर बेच रहे हैं।
पशुपालन विभाग और इस क्षेत्र के जानकार मानते हैं कि जिले में करीब साढ़े 12 लाख गोवंश एवं महिषवंश व चार लाख भेड़ और बकरी हैं।
इनका औसतन दूध उत्पादन प्रतिदिन 24 लाख लीटर है, जबकि जिले के करीब 12 लाख परिवारों एवं बाहर भेजे जाने वाले दूध एवं दूग्ध उत्पादों व जिले में प्रतिदिन बिकने वाले दुग्ध उत्पादों का औसत निकालें तो उक्त अनुमानों के तहत खपत 44 लाख लीटर प्रतिदिन की है।
ऐसे में उत्पादन एवं खपत के बीच लगभग दोगुने का अंतर है। अब यह अंतर पाटने के लिए मिलावट का खेल शुरू होता है। सूूत्रों का कहना है कि दूध में पानी मिलाना आम बात है।
खपत के सापेक्ष दूध में पानी मिलाकर मांग का एक बड़ा हिस्सा पानी की मिलावट से पूरा किया जाता रहा है। पिछले एक दशक में गाढ़े दूध की डिमांड काफी बढ़ी है।
इसके पीछे मिठाइयों के लिए खोया, पनीर, दही एवं मट्ठे के साथ घी की मांग बढ़ी है। इस कारण मिलावट का खेल में बढ़ा है और मिलावट के काले कारोबारी लोगों की सेहत के साथ सीधे तौर पर मिलावट के रूप में मीठा जहर बेच रहे हैं।
सरकारी कंगाल, निजी क्षेत्र की डेयरी मालामाल
दुधारू पशुओं का पालन बढ़ाने एवं किसानों की आमदनी बढ़ाने के साथ दूध की मांग के सापेक्ष उत्पादन लाने के लिए 1980 के दशक में शुरू हुई सहकारी दुग्ध उत्पादन समिति ने गांव गांव समितियां बनाकर दूध खरीद शुरू कर जिले में दूध व्यवसाय के प्रति अलख जगा दी थी।
उस समय जिले की एकलौती सरकारी डेयरी करीब एक लाख लीटर तक प्रतिदिन दूध की खरीद करती थी। यह वह दौर था, जब दूध की कीमत तीन रुपये प्रति लीटर थी और गांव के लोग दूध बेचने को तैयार नहीं होते थे।
उस समय दूध के उत्पादन एवं खपत में बहुत अंतर नहीं था। सहकारी डेयरी से जुड़े रहे श्याम विलास बताते हैं कि शुद्ध दूध एवं देसी घी, दही, मट्ठा, खोये का दौर था। पनीर का नाम तक गांवों के लोग नहीं जानते थे।
दूध की फैट के आधार पर पशुपालकों को भुगतान मिलता था, मगर धीरे-धीरे डेयरी भ्रष्टाचार के दीमकों ने चट करनी शुरू कर दी और बाद में कंगाल होकर बंद हो गई।
इसे फिर शुरू करने की कोशिश हो रही, मगर गांव-गांव पहुंच नहीं हो पा रही, जबकि निजी क्षेत्र की डेयरी यहां का दूध खरीद कर मालामाल हो रही है।
गांवों में बिकने लगे पैकेट बंद दूध, दुग्ध उत्पाद
दूध व्यवसाय से जुड़े पंकज सिंह बताते है कि दो दशक पहले तक शहर एवं कस्बों के लिए गांवों से दूध एवं दुग्ध उत्पादों की आपूर्ति होती थी।
गांवों में कमोवेश हर घर में दूध की व्यवस्था के लिए दुधारू पशु पाले जाते थे या फिर पास पड़ोसी से ले लिया जाता था, मगर अब गांवों तक निजी क्षेत्र की पहुंच चुकी डेयरी दूध खरीदती है और उसी दूध के पैकेट एवं दुग्ध उत्पाद घी, मट्ठा, दही के डिब्बे गांवों में बेच रही है।
साथ ही बड़े पैमाने पर बेनामी दूधिये दूध का व्यापार कर रहे हैं। हजारों लीटर दूध प्रतिदिन जिले के बाहर जा रहा, जिससे एक बात साफ है कि लोगों के बीच बढ़ रही दूध एवं दुग्ध उत्पादों की मांग के सापेक्ष उत्पादन नहीं हो पा रहा है।
मुनाफाखोरों का खेल, किसान रहे झेल
गांव से आकर शहर में घर-घर जाकर दूध बेचने वाले मुरले एवं राकेश कहते हैं कि दूध में पानी मिलाना आम बात है, क्योंकि लोग पैकिंग दूध 60 रुपये किलो ले लेते हैं, मगर किसान से 40 से 50 रुपये किलो के भाव पर ही खरीदते हैं।
गर्मी के मौसम में दूध का उत्पादन घट जाता है फिर भी लोग दाम बढ़ाने को तैयार नहीं होते हैं। ऐसे में महंगा भूसा-चारा, पानी एवं दौड़ के चक्कर में रहने वाले किसान पानी मिलाने को मजबूर होते हैं।
पूरे मसले मेें गांवों से दूध खरीद कर खोया बनाने वाले, पनीर बनाने वाले एवं बाहर दूध भेजने वाले मुनाफाखोर खेल करते हैं, जिससे किसानों को परेशान होना पड़ता है।
वह दावा करते हैं कि किसी भी आम किसान के यहां दूध में पानी के अलावा कोई मिलावट नहीं हो सकती है। गांव का गरीब किसान कम दामों पर दूध बेचने को मजबूर है, इसलिए दुुधारू पशुओं की संख्या बढ़ाने में उसे दिक्कत होती है।
इन क्षेत्रों में सबसे ज्यादा मिलावट का कारोबार
सदर क्षेत्र के आसपास गुपचुप तरीके से चल रही कई नामों एवं लोगों से मिलती जुलती डेयरी के पैकिंग बंद दूध एवं प्रोडक्ट्स के अलावा कुछ चर्चित क्षेत्रों के दूधिये मिलावट के खेल में शामिल हैं।
इस खेल में करोड़ों का काला कारोबार किया जा रहा है। संडीला, कछौना, बघौली, बेहंदर, अहिरोरी, कासिमपुर, भरावन, अतरौली, शाहाबाद, पिहानी, बिलग्राम आदि क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर कारोबारी सक्रिय हैं।
हो चुकी आजीवन कारावास की सजा
कई वर्ष पूर्व मिलावट के केस में संडीला क्षेत्र के एक व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा दी गई थी। खाद्य सुरक्षा विभाग की ओर से लिए जाने वाले नमूनों में जो असुरक्षित पाएजाते हैं, उनके खिलाफ एसीजीएम कोर्ट में केस दाखिल होता है।
करीब 350 केसों की कोर्ट में सुनवाई चल रही, जबकि जो नमूने अधोमानक एवं मिसब्रांड पाए जाते हैं, उनके केस एडीएम कोर्ट में दाखिल किए जाते हैं।
त्योहारों के समय पूरे जिले में विशेष अभियान चलाकर नमूने भरे जाते हैं। इसके लिए निरंतर सामान्य रूप से निरीक्षण चलता रहता है। अगले महीने से अभियान चलाकर नमूने लेकर परीक्षण के लिए भेजे जाएंगे।
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- सतीश कुमार, डीओ, खाद्य सुरक्षा विभाग
यह सही है कि जिले की आबादी एवं दूध उत्पादों की मांग के अनुसार प्रतिदिन उत्पादन के सापेक्ष खपत के दोगुने होने का अनुमान है।
अब समय आ गया है कि जब पशुपालक दुधारू पशुओं की नस्लों को लेकर और अधिक जागरूक बनें, ताकि ज्यादा दूध देने वाली नस्ल के पशुओं का पालन कर उत्पादन बढ़ाने के साथ आमदनी भी बढ़ा सकें।
- डॉ. जेएन पांडेय, सीवीओ, पशुपालन विभाग
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