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दो साल बाद उमड़ेगा भक्तों का हुजूम

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बेहटागोकुल। जिला मुख्यालय से हरदोई-शाहजहांपुर रोड पर 17 किमी दूर प्राचीन शिव संकट हरण मंदिर में महाशिवरात्रि पर करीब दो साल बाद मेले का आयोजन होगा।
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जिले के अलावा पड़ोसी जनपद सीतापुर, शाहजहांपुर, फर्रुखाबाद, लखनऊ से भी हजारों भक्त बाबा के दरबार में हाजिरी लगाने आते हैं। मंदिर के पुजारी सूर्य कमल गोस्वामी के मुताबिक, इस मंदिर पर मन्नत मांगने वाले कभी खाली हाथ नहीं लौटते।
बाबा सबकी झोली भरते हैं। कोरोना महामारी की वजह से पिछले दो वर्षों से यहां मेले का आयोजन नहीं किया गया था। इस बार संक्रमण का असर काफी कम है, इसलिए बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने की संभावना है।
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मंगलवार को महाशिवरात्रि के पर्व के लिए इस मंदिर में विशेष साफ-सफाई कराई जा रही है। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के आने की वजह से इसके आसपास तमाम सुरक्षा संसाधन लगाए गए हैं।
इसके अलावा भक्तों को मेले में घूमने में असुविधा न हो इसके लिए वाहनों की पार्किंग की अलग व्यवस्था की जा रही है। थाना प्रभारी ओपी सिंह ने बताया कि प्रदेश में विधानसभा चुनाव के चलते काफी कम सुरक्षा बल उपलब्ध है, लेकिन पुलिस-प्रशासन पूरी मुस्तैदी से काम करेगा।
दर्शन के लिए आने वाले भक्तों को कोई असुविधा नहीं होने दी जाएगी। बाबा के दरबार में आने वाले भक्तों की सुरक्षा के लिए तीसरी आंख भी खुली रहेगी। परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरे भी आने जाने वालों पर पूरी नजर रखेंगे।
भीड़ का फायदा उठाकर कोई गड़बड़ी न करे, इसके लिए कैमरों का सहयोग लिया जाएगा। इसके लिए कंट्रोल रूम बनाया गया है। कंट्रोल रूम से कैमरों की नजर में आने वाले लोगों पर नजर रखी जाएगी।
चमत्कारों से प्रासंगिक है यहां का शिवालय
सकाहा क्षेत्र में सिर्फ जंगल हुआ करते थे। जंगल में ही शिवलिंग स्थापित था। एक बार बावन के सेठ इधर से गुजर रहे थे। वह बहुत परेशान थे, उनके इकलौते पुत्र की बरेली में ब्रिटिश शासन में फांसी की सजा दी गई थी।
सेठ ने यहां आराम करने के दौरान अपने पुत्र के लिए भोले बाबा से प्रार्थना की। कहा जाता है कि फांसी के लिए जल्लाद ने बेटे के पैरों के नीचे से तख्त हटाना चाहा तो वह असफल रहा।
तीन बार प्रयास के बावजूद वह तख्त नहीं हटा सका। ब्रिटिश अधिकारी ने इस चमत्कार से प्रभावित होकर सेठ के पुत्र को बरी कर दिया। तब सेठ ने छोटा मंदिर बनवा दिया।
1948 में देश आजाद होने के बाद जब बेहटागोकुल थाना बना तो शिवशंकर शर्मा को यहां का थाना इंचार्ज बनाया गया। उनके कोई संतान नहीं थी। उन्होंने बाबा के दरबार में फरियाद की।
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उन्हें भी संतान सुख की प्राप्ति हुई। उन्होंने ग्रामीणों के सहयोग से भव्य मंदिर का निर्माण कराया, जिसमें जो जितना कर सकता था उतना दान कर सहयोग किया। 1948 से निर्माण प्रारंभ होकर 1951 में मंदिर बनकर तैयार हो गया।
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