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Hardoi News: सख्ती थोड़ी लाजिम है पर, पत्थर होना ठीक नहीं ...

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मल्लावां। द विश्वास फाउंडेशन के बैनर तले मल्लावां लिटरेचर फेस्टिवल में शायरों ने मुशायरे में अपनी रचानाओं की प्रस्तुतियों से समा बांध दिया। पिहानी से आए शायर सलमान जफर ने पढ़ा कि सख्ती थोड़ी लाजिम है पर, पत्थर होना ठीक नहीं, हिंदू, मुस्लिम ठीक है साहब, कट्टर होना ठीक नहीं।
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मिट्ठू बाबा मैदान पर मुशायरे में फर्रुखाबाद से आए नदीम फर्रुख ने पढ़ा कि मेरी किस्मत कि ये दुनिया मुझे पहचानती है, लोग मर जाते हैं पहचान बनाने के लिए। नैनीताल से आए मोहन मुंतजिर ने पढ़ा कि मुहब्बत के हसीं वादों के आगे, हकीकत आ गई ख्वाबों के आगे। बरेली से आए शरिक काफी ने पढ़ा कि कभी महफिल सजा कर भी न कट पाई है इक शाम, कहीं बीड़ी के बदले कैसा याराना मिला है। लखनऊ से आए पीयूष अग्निहोत्री ने पढ़ा कि 29 बरस हो गए वाक़ई..? लगा जैसे मेरी घड़ी तेज थी। शायर हिमांशी बाबरा ने पढ़ा कि मेरी दुनियां उजड़ गई उसमें, तुम जिसे हादसा समझते हो।
शायर दावर रजा ने पढ़ा कि करता है बादशाही गुलिस्तां में हर तरफ, महबूब तेरे पांवों का रौंदा हुआ गुलाब। हरदोई से आए कवि सत्यधार सत्या ने पढ़ा कि चार ये लोग मेरी बात करेंगे कब तक, फूल मुरझाए तो खुशबू भी चली जाती है। हरदोई से आए पवन प्रगति ने पढ़ा कि इस समय बनवास मेरा चल रहा है, क्या पता कल राम बनकर लौट आऊं। लखनऊ के आदर्श निखिल ने पढ़ा कि जुगनू को कंदील नहीं कह सकते हो, हर पोखर को झील नहीं कह सकते हो।
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लखनऊ के सोमनाथ कश्यप ने पढ़ा कि जब नजर से तुम्हारी नजर मिल गई, मानो प्यासे तटों को लहर मिल गई। हरदोई से आए अजीत शुक्ला ने पढ़ा कि बुजुर्गों से विरासत में मिली तहजीब कुछ ऐसी, बड़ों के सामने ये सिर अदब के साथ झुकता है। मल्लावां के आदर्श विश्वास ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रतियोगिता में सफल छात्र-छात्राओं को ब्रजेश वर्मा, टिल्लू व समाजसेवी विशाल जायसवाल ने पुरस्कृत किया। संचालन नदीम फर्रुख ने किया।
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