जिले के चारों विकास खंडों में मौजूद कृषि योग्य भूमि तेजी से बंजर होती जा रही है। रसायनिक उर्वरकों के सहारे खेतों में फसलें लहलहा रही हैं। मृदा में जीवांश कार्बन, पोटाश, फास्फोरस न्यून स्तर पर पहुंच गया है।
प्रयोगशाला में जांच को भेजे गए 13 हजार मृदा नमूनों के परीक्षण में यह खुलासा हुआ है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि अब जैविक उर्वरकों के प्रयोग से ही भूमि के गिरते स्वास्थ्य को सुधारा जा सकता है।
किसान अधिक फसल उत्पादन के चक्कर में भूमि में अंधाधुंध रसायनिक उर्वरकों का प्रयोग कर रहे हैं। इससे फसलों की उत्पादकता तो बढ़ रही है, लेकिन भूमि का स्वास्थ्य तेजी से बिगड़ता जा रहा है।
आलम यह है कि जिले की भूमि में पोषक तत्वों की मौजूदगी न्यून स्तर पर पहुंच चुकी है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि अब जिले की भूमि से बिना उर्वरक फसल की पैदावार असंभव है।
वर्ष 2015-16 में मृदा परीक्षण विभाग के अफसरों ने जिले के करीब 10 हजार मृदा सैंपल का परीक्षण किया था, तब मृदा में पोषक तत्वों की मौजूदगी मध्यम स्तर पर थी।
वहीं, वर्ष 2016-17 में लिए गए करीब 13679 मृदा सैंपल के रिपोर्ट के खुलासे में जिले की मृदा में जीवांश कार्बन, पोटाश और फास्फोरस की मौजूदगी न्यून स्तर पर पहुंच चुकी है। इससे साफ है कि जिले की भूमि तेजी से बंजर होती जा रही है।
मृदा में फास्फोरस की कमी से पौधे छोटे रह जाते हैं। पत्तियां गुलाबी रंग की हो जाती हैं। पोटाश की कमी से पौधे की पत्तियों का रंग पीला, हल्का भूरा रह जाता है। पौधे की पत्तियों के बाह्य किनारे फट जाते हैं। जीवांश कार्बन की कमी से पौधे की पत्तियां हल्के पीले रंग की हो जाती हैं और पौधा सूखने लगता है।
वहीं, कृषि अनुसंधान केंद्र मुरादनगर के फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. अरविंद यादव ने बताया कि वैज्ञानिक ढंग में खेती के लिए मिट्टी की जांच कराया जाना अनिवार्य है। मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी सामने आने पर ही उन्हें पूरा किया जाना संभव है।
मृदा में पोषक तत्वों की काफी कमी मिली है। रसायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से मृदा का स्वास्थ्य गिर रहा है। किसान मृदा परीक्षण रिपोर्ट के आधार पर अपने खेतों में जैविक उर्वरकों का प्रयोग कर भूमि को सही कर सकते हैं। एएन मिश्र, उप कृषि निदेशक