जलाशयों के घटते क्षेत्रफल और जलवायु में तेजी से हो रहे परिवर्तन के चलते साइबेरिया से आने वाले विदेशी मेहमान पक्षियों की संख्या में तेजी से गिरावट आ रही है। वर्ष 2014 में जहां सारसों की संख्या 28 थी, वहीं अब यह 23 रह गई है।
इसका खुलासा सारसों में लगाए गए ट्रांसमीटर से हुआ है। बावजूद इसके प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड संजीदा नहीं है। साइबेरिया, चीन, जापान, अफगानिस्तान जैसे देशों से सर्दी के मौसम में भारतीय उपमहाद्वीप में स्पून विल्ड डक, पेंटिड स्टार्क, पुचाड डक, ब्रह्मनी डक,
सुरखाब, गल, ब्लैक नेक्ड स्टॉर्क, वर हैडिऊ गूज, लार्ड कारमोरेंट, स्माल कारमोरेंट जैसे पक्षी बड़ी संख्या में आते थे। बीते दशक में इनकी संख्या चार गुना कम हो गई है। कृषि विभाग के प्राविधिक सहायक सतीश चंद्र शर्मा बताते हैं कि जलाशयों का क्षेत्रफल तेजी से घटता जा रहा है।
जिन स्थानों पर साल भर पानी भरा रहता था, उनमें अधिकांश पर अब खेती होने लगी है या वहां बिल्डिंगें खड़ी हो गई हैं। इससे जलाशयों के क्षेत्रफल में महज दो दशकों के भीतर ही 30 फीसदी तक गिरावट आ चुकी है।
उन्होंने बताया कि जलवायु में भी तेजी से परिवर्तन होने का सिलसिला बदस्तूर चल रहा है, क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में हरे भरे पेड़ों का अंधाधुंध कटान होने से सर्दी समेत बरसात का सीजन लगातार सिकुड़ रहा है,
जबकि गर्मी के सीजन में तेजी से इजाफा हो रहा है। इसका खुलासा राष्ट्रीय स्तर से जुड़ी पर्यावरण विभाग की रिपोर्ट में किया गया है।
विदेशी पक्षी पांच से लेकर छह हजार मील लंबा सफर तय कर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में पहुंचते हैं, जिनमें गढ़-ब्रजघाट गंगा नदी सबसे मुख्य स्थान मानी जाती है। यह पक्षी सूर्य, चंद्रमा और तारों की सहायता से अपने आवागमन वाले मार्ग का निर्धारण करते हैं,
इसमें पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी बेहद मददगार साबित होती है। अधिकांश पक्षी आवाज करते हुए एक समूह में उड़ान भरते हैं, जिनके आगे एक मार्गदर्शक पक्षी होता है। यह विशेष आवाज करता हुआ आगे चलता है और शेष पक्षी उसके पीछे चलते रहते हैं।
अलग-अलग पक्षियों की कतार भी अलग अलग होती हैं। पक्षियों की उड़ान और रफ्तार में काफी विविधता रहती है, क्योंकि छोटे पक्षी प्रतिदिन 6 से 11 घंटा और बड़े पक्षी बिना रुके हजारों मील लंबा सफर करते हैं।
पर्यावरणविद डॉ. अब्बास अली ने बताया कि मेहमान पक्षियों में सर्वाधिक संख्या सारस की घट रही है। शासन स्तर से हर साल इनकी गणना कराई जाती है। सारसों में लगाए गए ट्रांसमीटर से इनकी संख्या घटने की पुष्टि हुई है।
लुप्त होने के कगार पर पहुंच चुकी सारस का प्रवास के दौरान पाकिस्तान, अफगानिस्तान और भारत के दूरस्थ अंचल में शिकार भी होता है। इसके चलते इनकी संख्या तेजी से घट रही है।