चुनाव आयोग के खौफ के चलते जहां चुनावी रौनक नदारद है, वहीं वोटर की खामोशी प्रत्याशियों और प्रमुख दलों के पदाधिकारियों के लिए बेचैनी का सबब बनी है। सपा, भाजपा, बसपा और कांग्रेस चारों ही दलों के पदाधिकारी चुनाव प्रचार में दिन रात एक किए हुए हैं।
मगर वोटर के मन की थाह नहीं मिल रही है। मतदाता सभी को समर्थन देने की बात कह कर टरका रहे है। ऐसे में प्रमुख दलों के नेता और कार्यकर्ताओं में भी चर्चा है कि मतदाताओं की खामोशी न जाने क्या गुल खिलाएगी?
पिछले चुनावों पर गौर किया जाए तो प्रचार साधनों के माध्यम से अनुमान लग जाता था कि किस प्रत्याशी की ओर मतदाताओं का रुझान है। नगर और देहात क्षेत्रों में घरों और प्रतिष्ठानों पर लगे झंडे बैनर देखकर अंदाजा लगता था कि किस प्रत्याशी का किस इलाके में जोर है।
वहीं वोटर भी प्रत्याशी और पार्टी को लेकर खुलकर चर्चा करते थे। इस बार स्थिति बदली हुई नजर आ रही है। चुनाव आयोग के खौफ के चलते प्रत्याशी और प्रमुख दलों के पदाधिकारी प्रचार साधनों के प्रयोग से गुरेज कर रहे हैं।
वहीं इस बार मतदाता भी चुनाव को लेकर चुप्पी साधे हैं। ऐसे में हार जीत को लेकर हवा में तीर चलाए जा रहे हैं। भले ही विभिन्न राजनीतिक दलों के पदाधिकारी और कार्यकर्ता जातीय समीकरणों के हिसाब से जीत हार का गुणा भाग लगा कर अपनी अपनी जीत के दावे कर रहे हों।
अंदर ही अंदर वह भी उनके दावों को लेकर आशंकित हैं। नेताओं का कहना है कि मतदाताओं की ऐसी चुप्पी पहली बार देखने को मिल रही है।
वोटर की चुप्पी क्या गुल खिलाएगी यह तो आने वाला समय ही बताएगा? इतना जरूर है कि मतदाताओं की रहस्यम खामोशी ने राजनीतिक दलों की नींद उड़ा दी है।