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449 वोटों से टूट गया था कैलाश प्रकाश का विधायक बनने का सपना

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449 वोटों से टूट गया था कैलाश प्रकाश का विधायक बनने का सपना
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हापुड़। चुनाव में मतदान का महत्व तब अधिक समझ में आता है, जब मामूली अंतर से जीत अथवा हार मिलती है। आजादी के बाद वर्ष 1962 में तीसरी बार हुई विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी से हापुड़ सीट पर चुनाव लड़े कैलाश प्रकाश चुनाव हार गए। उन्हें आईएनडी पार्टी के प्रेम सुंदर ने हराया था। कैलाश प्रकाश को 449 वोट कम मिले थे, जिस वजह से उनका विधायक बनने का सपना चकनाचूर हो गया। अब तक जिले के छह प्रत्याशी ऐसे रहे हैं जो 1500 से 2100 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए और विधायक नहीं बन सके।
चुनाव आयोग की वेबसाइट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, आजादी के बाद हुए 17 विधानसभा चुनावों में सबसे कम वोटों से प्रेम सुंदर के बाद कांग्रेस के कुंवर वीरेंद्र सिंह ढहाना मात्र 1062 वोटों से चुनाव जीते और जेएनपी के विजयपाल सिंह की विधायक बनने की इच्छा पूरी नहीं हो सकी। सबसे ज्यादा कांटे की टक्कर हापुड़ और गढ़ विधानसभा क्षेत्र पर ही रही है। इनमें से सभी मुकाबले आमने-सामने के थे और जिनमें मामूली अंतर से ही जीत-हार हुई ।
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दो बार जीतने से रह गए वीर सैन
कांग्रेस नेता वीर सैन ने लगातार वर्ष 1951 और 1957 का चुनाव लड़ा। लेकिन दोनों ही चुनाव में वह हार गए। 1951 में लुत्फ अली ने वीर सैन को 3092 और वर्ष 1957 को 4428 वोटों से हरा दिया। इस हार को वीर सैन भुला न सके।
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2017 में डॉ. रमेशचंद तोमर का मुरझा गया था फूल
हापुड़-गाजियाबाद लोकसभा क्षेत्र से भाजपा से चार बार सांसद और भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष रह चुके डॉ. रमेशचंद तोमर का वर्ष 2017 में बसपा के प्रत्याशी असलम चौधरी के सामने फूल मुरझा गया था। रमेशचंद तोमर को उस चुनाव में 3576 वोटों से हार का सामना करना पड़ा था। जबकि, उस समय का बड़ा चेहरा माने जाने वाले डॉ. रमेशचंद तोमर के समर्थकों को इसकी उम्मीद नहीं थी।
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साल विधानसभा विजेता वोट हारे वोट अंतर
1962 हापुड़ प्रेम सुंदर 21407 कैलाश प्रकाश 20958 449
1967 हापुड़ डीडी सैन 24395 एमएस पार्चा 23078 1317
1980 गढ़मुक्तेश्वर कुंवर वीरेंद्र सिंह ढहाना 22645 विजयपाल सिंह 43880 1062
1989 हापुड़ गजराज सिंह 46089 बनारसी दास 43880 2209
1989 गढ़मुक्तेश्वर अख्तर 44417 कनक सिंह 42223 2194
1991 गढ़मुक्तेश्वर कृष्णवीर सिंह सिरोही 24130 अख्तर 22030 2100
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