पांच साल पहले आज ही के दिन हापुड़ गाजियाबाद से अलग होकर जिला के रूप में प्रदेश के मानचित्र पर उभरा था। इन पांच सालों में हापुड़ जिला विकास के पथ पर अग्रसर जरूर है
लेकिन रफ्तार सुस्त होने के चलते अब तक अपेक्षित विकास नहीं कर पाया है। सबसे बड़ी बात यह है कि जिले का संचालन अब भी अस्थायी कार्यालयों से हो रहे हैं।
दरअसल, 28 सितंबर 2011 को हापुड़ में आयोजित एक कार्यक्रम में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने हापुड़ को जिला घोषित कर इसका नामकरण पंचशील नगर किया था। उसके बाद चुनाव हुए और समाजवादी पार्टी
प्रदेश की सत्ता में आयी तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने फिर इसका नाम बदलकर हापुड़ कर दिया। इन पांच वर्षों में जिले के रूप में हापुड़ में कई बदलाव हुए हैं लेकिन अपेक्षा के अनुरूप इसका विकास नहीं हो पाया है।
सबसे बड़ा बदलाव प्रशासनिक ढांचे का विकास है। फिलहाल सभी कार्यालय अस्थायी भवनों में चल रहे हैं। लेकिन प्रशासन का कहना है कि 2017 में अधिकतर कार्यालय अपने स्थायी भवनों में शिफ्ट हो जाएंगे।
मनीष नीटू का कहना है कि पांच साल में जिले की स्थिति में कोई खास बदलाव नहीं हुआ है। जाम, पार्किंग, अतिक्रमण जैसी समस्याएं आज भी शहर को आए दिन बंधक बना रही हैं।
उद्यमी टुक्कीराम गर्ग का कहना है कि व्यवसाय के मामले में भी जिले में कुछ खास बदलाव नहीं हुए हैं। अब भी जिले में अपराध का बोलबाला है। व्यापारियों का उत्पीड़न बढ़ गया है।
जिलाधिकारी अनिल ढींगरा का कहना है कि हापुड़ विकास के पथ पर अग्रसर है। जो भी समस्याएं हैं उन्हें दूर करने का प्रयास किया जा रहा है। उनके यहां का कार्यभार संभालने के बाद कई कार्यालय लगभग तैयार हैं
और कलक्ट्रेट सहित अधिकतर कार्यालय अगले वर्ष तक तैयार कर लिए जाएंगे। जिला कारागार की जमीन के मामले में भी जल्द फैसला ले लिया जाएगा।