अपराधों पर नकेल कसना तो दूर , खाकी संगीन वारदातों का खुलासा भी नहीं कर पा रही है। क्राइम के आंकड़ों को छिपाने के लिए लूटपाट की वारदातों की रिपोर्ट दर्ज करने की बजाए पीड़ितों को टरका देते हैं।
इससे बदमाशों का हौंसला बढ़ना तय है। शासन की प्राथमिकता भयमुक्त समाज बनाने की है। इसके बाद भी अपराधों पर नियंत्रण नहीं हो रहा है। इसके लिए पुलिस की कार्यप्रणाली जिम्मेदार है।
बहादुरगढ़ क्षेत्र के एक गांव में 22 अक्तूबर को बकरी चराने गई तीसरी क्लास में पढ़ने वाली दलित बच्ची को अगवा कर लिया गया था। उसके साथ रेप करने के बाद उसकी गला घोंटकर हत्या कर डाली थी।
एसपी अलंकृता सिंह ने हापुड़ और पिलखुवा सीओ की संयुक्त अध्यक्षता में एक टीम का गठन किया है। एक माह बाद भी आरोपी पकड़ से बाहर है। वहीं विदेश सेवा के पूर्व प्रोटोकॉल अफसर डीएस वर्मा का 13 अक्तूबर की रात
कार समेत अपहरण करने वाले बदमाशों ने उनकी हत्या करने के बाद रिवाल्वर लूट ली थी। इसमें विक्रांत उर्फ जोनी और मोहित गुर्जर को नोएडा की बिसरख पुलिस ने जेल भेजा था। अभी तक पूर्व अफसर का शव बरामद नहीं हो पाया है।
इस हाई प्रोफाइल मामले में हापुड़ की गढ़, मेरठ की किठौर और अमरोहा की गजरौला पुलिस एक सप्ताह तक रिपोर्ट लिखने की बजाए घटनास्थल को एक-दूसरे के क्षेत्र में धकेलने में जुटी रही थी।
आला अफसरों की हिदायत पर किठौर में रिपोर्ट दर्ज हुई थी, लेकिन बाद में तफ्तीश को गढ़ में ट्रांसफर कर दिया गया था। इसके अलावा महिलाओं से छेड़खानी और लूटपाट की घटनाएं भी अक्सर होती रहती हैं, लेकिन पुलिस रिपोर्ट लिखने की बजाए पीड़ितों को टरका देती है।
इंस्पेक्टर समरजीत सिंह का कहना है कि डीआईजी का अप्रूवल न लिए जाने पर डीएस वर्मा हत्याकांड से जुड़ी विवेचना एसपी कार्यालय से मेरठ को लौटा दी गई थी। अब वापस मिलते ही कार्रवाई की जाएगी।