गंगा में डूबते लोग और फाइलों में बजट
गंगा किनारे का मंजर बुधवार को बड़ा गमगीन था। गंगा किनारे में डूबते अपनों को बचाने के लिए मां-बहन चिल्ला-बिलबिला रहीं थीं, लेकिन जिन गोताखोरों पर हर साल लाखों रुपये खर्च किए जाते हैं।
उनका कहीं पता नहीं था। दरअसल पालिका के रिकार्ड में गंगा किनारे गोताखोर 24 घंटे तैनात रहते हैं, जबकि वास्तविकता इससे अलग हैं। कमीशन के खेल में पालिका के बाबूओं को खुश रखने वाले गोताखोर यहां रहते ही नहीं हैं। यही कारण है रोजाना होने वाली घटनाओं के दौरान कभी भी पालिका के गोताखोर मौके पर नहीं होते हैं।
यहां गंगा में हर महीने लाखों लोग डुबकी लगाते हैं। रोजाना दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान समेत यूपी के हजारों लोग धार्मिक अनुष्ठान करने आते हैं। हर साल दर्जनों लोग गंगा में डूब जाते हैं, जिनमें अधिकांश के तो शव भी नहीं मिल पाते हैं।
डूबने की घटनाओं को रोकने के लिए पालिका ने गंगा किनारे बैरिकेडिंग कराने के अलावा भी नावों व गोताखोरों की तैनाती की हुई है। इन पर हर साल 50 लाख से ज्यादा खर्च होते है। फिर भी पालिका के इंतजाम कारगर साबित नहीं हो रहे हैं।
दरअसल ज्यादातर गोताखोर फाइलों में ही ड्यूटी करते हैं। पंकज के डूबने के दौरान बुधवार को स्नान कर रहे बालेश्वर मेरठ, रामवीर बुलंदशहर और विरेंद्र सिंह बागपत ने बताया कि उसकी मां और दो बहनें मदद के लिए शोर मचाती रहीं, लेकिन पालिका के गोताखोरों का कहीं अता पता नहीं था। नाव चलाने वाले मल्लाह जब तक हरकत में आए तो बहुत देर हो चुकी थी।
एसडीएम मीनू राणा का कहना है कि गंगा किनारे गोताखोरों के मौजूद न रहने की जांच होगी। गड़बड़ी सामने आने पर पालिका के गोताखोरों और उनको संरक्षण देने वालों पर कार्रवाई की जाएगी। डूबने की रोकथाम से जुड़े बंदोबस्त को पूरी तरह चाक चौबंद कराया जाएगा।