पुरानी परंपरा है कि निकासी (बारात का लड़की के घर प्रस्थान) से पहले दूल्हा कुएं की पूजा करता है।
दीगर मांगलिक कार्यों के दौरान भी यह पूजन होता है। कुएं तो पाट दिए गए लेकिन परंपरा बची हुई है।
इसके निर्वाह का लोगों ने नायाब रास्ता तलाश लिया है। कुएं की जगह अब हैंडपंप की पूजा की जा रही है।
कहीं-कहीं तो लोग पानी भरी बाल्टी, घड़ा या लोटा पूजवा कर परंपरा का निर्वाह रहे हैं। सहालग के इन दिनों में यह दृश्य घुड़चढ़ी से पहले शादी वाले घरों में देखे जा सकते हैं।
कभी कुएं ही पेयजल का स्रोत होते थे। ये जीवन से इतना जुड़े थे कि इन्हें पूजन की परंपरा पड़ी। ये भूगर्भीय जलस्तर बनाए रखने में मददगार भी थे। जिले में कभी 30 हजार कुएं हुआ करते थे।
कई तो सैकड़ों साल के इतिहास के साक्षी थे। देखरेख के अभाव में वे खुद इतिहास हो रहे हैं। लघु सिंचाई विभाग के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में मात्र 677 कुएं ही बचे हैं। किस हाल में हैं, इसकी जानकारी विभाग को नहीं है।
1976 के बाद से नया बनना तो दूर, कुओं की देखरेख भी बंद हो गई। अब हाल यह है कि कुएं की जगह प्रतीक के रूप में बाल्टी-लोटा पूजे जा रहे हैं।
बंजारा व्यापारी ने बनवाया था कुआं
नगर के तहसील तिराहे पर स्थित कुआं काफी पुराना है। बताते है, आजादी से पूर्व दूर से व्यापारियों के आवागमन का यही मार्ग था। यहां सराय तो थी पर मगर पीने के पानी की व्यवस्था नहीं थी।
व्यापार के सिलसिले में आया एक बंजारा यहां ठहरा। उसी ने कुएं का निर्माण कराया। एक दशक पूर्व तक इससे पानी मिलता था। अब इसे पालिका ने बंद करा दिया।
कुआं पूजन, बेटे द्वारा शादी के बाद भी मां से पहले जैसे प्रेम के संकल्प और जीवन में पानी का महत्व दर्शाने का प्रतीक है। कुएं नहीं रहे तो जैसे-तैसे परंपरा निभाई जा रही है।
-पंडित राजकुमार मिश्रा
परंपरा सदियों पुरानी है लेकिन अब कुएं बंद होने से टूट रही है। कुआं न मिलने पर हैंडपंप आदि की पूजा और उसे कूदने की रीति नहीं चलनी चाहिए।
-शारदा देवी, मोहल्ला न्यू गाड़ीवान
स्थिति तो वर्षों पूर्व तभी बिगड़ गई थी जब पानी मोल बिकने लगा। लेकिन ऐसी आशंका न थी कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब तलाश के बाद भी कुएं न मिलेंगे -विनय सोती, सामाजिक कार्यकर्ता