कस्बे के रहमानियां कालेज में संस्थापक हाजी सैय्यद मोहम्मद सलीम जाफरी की याद में आयोजित मौलाना डे कार्यक्रम के दूसरे दिन शनिवार को पूर्व छात्रों का सम्मेलन हुआ। इसमें अच्छी शिक्षा, माहौल के लिए महाविद्यालय की स्थापना का सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया।
शनिवार सुबह विद्यालय हाल में हुए कार्यक्रम में अबरार अहमद आईएएस, डॉ.फहीम खां प्रसिद्ध चिकित्सक हाल मुकाम इंग्लैंड, मुख्तार अहमद सेवानिवृत्त प्रोफेसर अलीगढ़, उच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता/पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कबीर अहमद मौजूद रहे। विद्यालय प्रबंधक हाजी सफी अहमद खां ने बेहतर शिक्षा और विद्यालय विकास के लिए प्रस्ताव रखा।
इस मौके पर दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर वीके त्रिपाठी भी मौजूद रहे। वरिष्ठ अधिवक्ता कबीर अहमद ने कालेज की तरक्की के बारे में बताया। अबरार अहमद आईएएस ने कहा कि आपसी सहमति से तरक्की के रास्ते खुलते हैं। योग्य छात्रों को यदि शिक्षण कार्य में बाधा हो तो एक-एक छात्र की आगे की पढ़ाई की जिम्मेदारी भी लें। विदेश से आए डा. फहीम खां ने इस कार्य के लिए सहयोगी समितियों का गठन करने पर जोर दिया।
कार्यक्रम में विद्यालय समिति के साथ ही सहयोगी समिति बनाने का फैसला लिया गया। कार्यक्रम में पूर्व छात्र मुस्तकीम फारुखी, चौधरी हिदायतुल्ला एलएलएम, चीफ इं. मोहम्मद इसराइल, राजू पुत्र डॉ. हलीम ने विचार रखे। मौके पर आयकर के वरिष्ठ अधिवक्ता अखलाक अहमद, विभिन्न उद्योगों को संचालित करने वाले मोहम्मद वाकर रंगा,
दिल्ली से आए नसीम खां, कालेज के अध्यापक आरके त्रिपाठी, संत प्रकाश, पूर्व प्राचार्य मोहम्मद याकूब, मोहम्मद मजहर नियाज, रागौल प्रधान नूर अली, अधिवक्ता जावेद अहमद, डॉ. मोहम्मद इसराइल, दिल्ली से आए नजमुद्दीन, नसीरूद्दीन, मसूद अहमद आदि मौजूद रहे।
शिक्षा की मशाल लेकर 1915 में आए थे मौलाना
मौदहा। रहमानियां इंटर कालेज के संस्थापक मौलाना सैय्यद सलीम जाफरी बुंदेलखंड के इस पिछड़े क्षेत्र में शिक्षा की मशाल लेकर 1915 में आए थे। उन्होंने 1919 में मदरसा मकतब से यहां शिक्षा की शुरुआत की और 1952 में रहमानियां इंटर कालेज को मान्यता दिलाई। उन्होंने हलीम मुस्लिम यतीमखाना, छात्राओं के लिए जूनियर स्कूल की भी स्थापना की।
संस्थापक मौलाना सैय्यद जाफरी के जीवन और उनके द्वारा कराए गए कार्यों की जानकारी प्रबंधक सफी अहमद खां ने दी। बताया कि इलाहाबाद की चायल तहसील से इस क्षेत्र में शिक्षा की मशाल लेकर आए मौलाना को कभी भुलाया नहीं जा सकता। यहां के पढ़े हुए हजारों छात्र अमेरिका, इंग्लैंड, सउदी अरब अमीरात, पाकिस्तान, अफ्रीका, कनाडा और देश में नाम रोशन कर रहे हैं।