हमीरपुर। सामूहिक दुष्कर्म पीड़िता किशोरी का शव शनिवार सुबह लखनऊ से गांव आया। शव के पहुंचते ही परिजन बिलखने लगे। इसके बाद सुबह आठ बजे परिजनों ने ग्रामीणों व पुलिस की मौजूदगी में बेतवा नदी में जल प्रवाह कर अंतिम संस्कार किया। इस बीच लोगों में शासन-प्रशासन के रवैये के प्रति आक्रोश दिखा।
जलालपुर थाना क्षेत्र के एक गांव निवासी पिता ने बताया कि मेरी बेटी की हालत नाजुक रही लेकिन किसी से कोई मदद नहीं मिली। समय रहते इलाज मिलता तो अपने इन हाथों से बेटी को जल प्रवाह न करना पड़ता। बिटिया के हाथ पीले करने का जो सपना देखा था वह टूट गया। उसने बताया कि 28 अक्तूबर की घटना है। तब से बेटी के जीवन को बचाने के लिए अस्पतालों के चक्कर काटता रहा। दुष्कर्म करने वालों ने उसके साथ बर्बरता की और उसे तेजाब पिलाकर मौत के मुहाने पर छोड़ दिया था। लखनऊ से जब शव गांव पहुंचा तो हर कोई इस घटना की निंदा कर रहा था।
शव को कुछ देर घर पर रखने के बाद पुलिस की मौजूदगी में बेतवा नदी ले जाया गया। यहां पर उसे जल प्रवाह कर अंतिम विदाई दी। इस दौरान पिता की आंखों से आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। रोते हुए पिता बोला 30 दिन में एक दिन के लिए घर आया था। उसी दिन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराकर उसी शाम फिर अस्पताल लौटना पड़ा था। इसके बाद पूरा समय अस्पतालों में ही बीता है। इलाज में सबसे बड़ी कठिनाई लखनऊ के केजीएमयू और पीजीआई में आई। केजीएमयू में बेटी तीन दिन तक स्ट्रेचर पर पड़ी रही। समय पर भर्ती न होने से हालत और बिगड़ गई। पीजीआई में थोड़ी सुधार की उम्मीद दिखी थी, लेकिन डॉक्टरों ने सर्जरी के लिए दो लाख रुपये जमा करने को कहा था। भूमिहीन होने के कारण वह रकम नहीं जुटा सका। शासन-प्रशासन से कोई आर्थिक मदद तक नहीं मिली। इस दौरान 500 रुपये इंडोस्कॉपी व 700 रुपये पोस्टमार्टम के नमूने के लिए दिए हैं।
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खर्च कर डाले साढ़े तीन लाख रुपये, नहीं बची जान
पीड़िता जब मां के गर्भ में थी, तभी पिता की मौत हो गई थी। कुछ समय बाद मां ने देवर से शादी कर ली, जिससे दो बेटे हैं। परिवार पहले से ही आर्थिक संकट में था। बीते अप्रैल में पीड़िता की बड़ी बहन की शादी की थी। इसमें एक लाख रुपये का कर्ज हो गया था। साढ़े तीन लाख से अधिक उपचार में खर्च हो गया। घटना के बाद उन्होंने लगभग 900 किलोमीटर का सफर तय किया और पांच जिलों के सात अस्पतालों में इलाज की तलाश की, लेकिन कहीं भी राहत नहीं मिली। अगर सही समय पर उपचार मिल जाता तो बेटी की जान बच सकती थी। अब उन्हें किसी तरह की सहायता नहीं चाहिए। बेटी को न्याय चाहिए और आरोपियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
पीड़िता के 161 के बयान लिए गए हैं। इसके अलावा लखनऊ महिला पुलिस ने भी गोपनीय बयान लिए हैं। सभी एंगल से जांच की जा रही है। मेडिकल रिपोर्ट व बयान की काॅपी आने के बाद स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। स्थिति सामान्य है और मृतका का अंतिम संस्कार भी करा दिया गया है।
- शहरुख खान, सीओ सरीला
बड़ी बेटी के विवाह कर्ज पहले से ही था
पिता ने बताया कि अप्रैल में पीड़िता की बड़ी बहन की शादी की थी, जिसमें एक लाख रुपये का कर्ज हो गया था। साढ़े तीन लाख से अधिक उपचार में खर्च हो गया। पिता ने कहा कि घटना के बाद उन्होंने लगभग 900 किलोमीटर का सफर तय किया और पांच जिलों के सात अस्पतालों में इलाज की तलाश की, लेकिन कहीं भी समय पर राहत नहीं मिली। उनका कहना है कि अगर सही समय पर उपचार मिल जाता तो बेटी की जान बच सकती थी। उन्होंने साफ कहा कि अब उन्हें किसी तरह की सहायता नहीं चाहिए, बस बेटी को न्याय चाहिए और आरोपियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
अनसुलझे सवाल
- घटना 28 अक्टूबर की रात हुई लेकिन गैंगरेप और तेजाब पिलाने का मामला 7 नवंबर को एफआईआर के बाद ही सामने क्यों आया? परिजन और अस्पताल दोनों चुप क्यों रहे?
-झांसी मेडिकल कॉलेज में किशोरी 10 दिन भर्ती रही लेकिन वहां से पुलिस को सूचना क्यों नहीं भेजी गई? क्या एसएलसी में देरी हुई या दबाया गया?
-शुरूआती एफआईआर में केवल एक नाबालिग आरोपी का नाम था, लेकिन बाद में पीड़िता ने दो और युवकों को पहचान कैसे की? क्या यह बयान पहले क्यों नहीं लिया गया?
- तेजाब पिलाने जैसा गंभीर आरोप था तो क्या पहली मेडिकल रिपोर्ट में यह दर्ज हुआ
तेजाब की पुष्टि देर से क्यों हुई
पुलिस ने (164) के बयान समय पर क्यों नहीं कराए, जब पीड़िता कई अस्पतालों में कई दिनों तक भर्ती थी?
-दो अन्य आरोपियों की गिरफ्तारी पीड़िता के लखनऊ में लिए गए बयान के बाद ही क्यों हुई? क्या पुलिस शुरू से कोई लाइन मिस कर रही थी?
-मौत के बाद पोस्टमार्टम व फॉरेंसिक रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक क्यों नहीं की गई? क्या इससे इलाज और जांच दोनों की लापरवाही सामने आएगी?