हमीरपुर। जेल में पिटाई से बंदी अनिल द्विवेदी मौत के बाद जेल की अव्यवस्थाओं की पोल हर रोज खुल रही है। बीते आठ माह में जिला कारागार में आठ बंदियों की मौत चिकित्सा सुविधा नहीं मिलने की वजह से हुई है। जान गंवाने वाले बंदियों के परिजनों आरोप लगाया है कि जेलर की तानाशाही की वजह से बंदियों को उचित चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाई, जिससे उनकी जान चली गई। इस दौरान केपी चंदीला जेलर रहे थे।
वहीं, गुरुवार को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय ने भी कहा था कि जिला जेल में सात माह में सात बंदियों की मौत हो गई है। इस मामले में उन्होंने सरकार को घेरा भी था। हालांकि इस मामले में जेल अधीक्षक जेल प्रशासन को दोष देना उचित नहीं मानते। वह पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा कर देते हैं। कहते हैं कि जिला अस्पताल में ही इलाज की उचित व्यवस्था नहीं है तो जेल में क्या होगी?
जिला कारागार में बीती फरवरी से अब तक जान गंवाने वाले निरुद्ध आठ बंदियों में मौदहा क्षेत्र के कम्हरिया गांव निवासी नसीमुद्दीन, सुमेरपुर के चांद थोक मोहल्ला निवासी हनीफ, सुमेरपुर निवासी कांग्रेस नेता आलोक पालीवाल, विकास, सुखवीर, राकेश पाल व घासीराम के नाम शामिल हैंं।
नसीमुद्दीन के भाई अलीम के अनुसार पांच माह पहले उसके भाई के हार्ट का आपरेशन हुआ था। डॉक्टर ने जेल प्रशासन से स्पष्ट रूप से उन्हें एंबुलेंस से लखनऊ से जेल ले जाने की हिदायत दी थी लेकिन जेल कर्मी उन्हें जेल के डग्गा से लेकर हमीरपुर जेल लाए। झटके लगने से जेल के अंदर ले जाते ही भाई की मौत हो गई।
हनीफ के बेटे सलमान ने आरोप लगाया कि जेल में उनके पिता को असहनीय दर्द हुआ। बार-बार आग्रह के बाद भी उन्हें जेल से बाहर इलाज के लिए नहीं भेजा गया। 25 जुलाई 2025 को इलाज के अभाव में उनकी मौत हो गई।
आलोक पालीवाल के भाई अजय पालीवाल ने आरोप लगाया कि जेल प्रशासन की मनमानी के चलते उनके भाई की मौत हुई है। बताया कि उनके भाई की 21 अक्तूबर 2021 को दिल्ली के अपोलो अस्पताल में किडनी ट्रांसप्लांट हुई। 12 जनवरी 2025 को उन्हें हत्या के मामले में जेल जाना पड़ा। जेल में तबीयत खराब होने पर कई बार अपोलो दिल्ली में इलाज की अनुमति मांगी गई जोकि नहीं मिली। ज्यादा तबीयत बिगड़ने पर उन्हें लखनऊ पीजीआई ले गए। डाक्टरों ने देरी होने की बात कह सुधार की संभावनाएं कम बताते हुए इलाज किया। तीन जून 2025 को उनकी मौत हो गई।
इसी तरह का आरोप बंदी अनिल के परिजनों ने लगाया है। चचेरे भाई सुमित के अनुसार मारपीट के बाद हालात बिगड़ने पर उन्हें समय से इलाज नहीं दिया गया। इसी कारण उनकी मौत हो गई। इसी प्रकार बंदी विकास, सुखबीर, राकेश पाल व घासीराम के परिजन भी आरोप लगाते हैं कि चिकित्सीय अभाव में इनकी मौत हो गई।
चिकित्सा के अभाव में बंदियों की मौत के मामले में जेल प्रशासन को दोष देना उचित नहीं है। जिला अस्पताल में इलाज की उचित व्यवस्था नहीं है तो जेल में क्या होगी? हमीरपुर से कानपुर बंदियों को भेजने पर वहां भर्ती कराने में घंटों लाइन लगानी पड़ती है। ऐसे में बंदियों व उनके परिजनों को देरी होती है। बंदी नसीम की मौत जेल में नहीं हुई। वहां से लाने पर गेट पर जैसे ही तबीयत बिगड़ी उन्हें जिला अस्पताल भेजा गया, वहां उनकी मौत हुई। बंदियों को बाहर भेजने के लिए गार्ड की व्यवस्था करनी पड़ती है। नसीम को कानपुर से लाने वाले जेलकर्मी नहीं, पुलिसकर्मी थे।
- मंजीव विश्वकर्मा, जेल अधीक्षक।