मौदहा (हमीरपुर)। पवित्र माह रमजान की कद्र करनी चाहिए। रमजान उल मुबारक के तीन अशरे होते हैं। शहर के पेश इमाम हाफिज मौलाना सैय्यद करामत उल्ला ने कहा पहले दस दिन अल्लाह से रहमत की तलाश करने के लिए सबसे अच्छे हैं, क्योंकि उसमें रहमत की कोई तादाद नहीं होती। रोजा भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं है। इसका मकसद बहुत अहम और गहराइयों वाला है। यही वजह है की हर धर्म मजहब में किसी न किसी शक्ल में रोजा या वृत होता है। तकरीबन 15 घंटे तक बिना खाए पिए सख्त गर्मी में यह तपस्या तंगहाली और फांकाकशी से आए दिन जूझने वालों की तकलीफों का एहसास कराने के साथ ही उनके लिए हमदर्दी पैदा करती है।
रोजा न सिर्फ भूख, प्यास का एहसास कराता है, बल्कि सभी बुरे कामों, झूठ, चुगली और दूसरी तमाम बुराइयों और दूसरों को तकलीफ देने के कामों से रोकता है। रोजा हमदर्दी का जज्बा पैदा करता है। कहा, बहुत से लोग फांकाकशी के हालत में जी रहे हैं। रोजदार अपनी इफ्तारी से कुछ हिस्सा उन तक पहुंचाएं और अपने अंदर अल्लाह की इबादत के साथ ही उसकी मखलूक की खिदमत का जज्बा पैदा करें। दुआ करें कि अल्लाह तबारक तआला इस वबा (महामारी) को पूरी दुनियां से और खुसूसन हमारे मुल्क से इसका खात्मा फरमाए। (संवाद)