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सावन : महामारी के दौर में भी विरासत से लगाव, आधुनिकता के दौर में गांवों तक ही सिमटी सावन की पहचान

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मनकीखुर्द में बच्चों को झूला झुलाते फिल्म कलाकार सोमेंद्र कुमार। - फोटो : HAMIRPUR
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हमीरपुर। सावन माह भोले नाथ की आराधना के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। इस माह में बच्चे भी झूलेे डालकर आमोद-प्रमोद करते हैं, लेकिन अब धीरे-धीरे आधुनिकता के दौर के कारण झूले झूलने की परंपराएं गांवों तक सिमट कर रह गई हैं।
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कलौलीजार के पूर्व प्रधान बाबूराम प्रकाश त्रिपाठी ने बताया एक समय सावन माह में चारों ओर उल्लास और उमंग का माहौल होता था। घर के बड़े बुजुर्ग भगवान भोले नाथ की उपासना और कीर्तन भजन के माध्यम से भक्ति रस में मस्त रहते थे, जबकि गांव में बालिकाएं दरवाजे पर गुट्टा खेलती थी। मेंहदी रचाने व गीत गाए जाने की परंपराएं कायम थी। गलियों में बच्चे भौंरा नचाते थे। दौड़, कबड्डी, सर्रा व सिलोर जैसे खेलों की भी धूम मचती थी।
झूले पड़ने से बच्चों के साथ बड़े भी लुत्फ उठाते थे। मगर अब ये परंपराएं शहरों में तो पूरी तरह से खत्म हो चुकी हैं। कुरारा कस्बे के ओमप्रकाश मिश्रा ने बताया अब तो मन भावन सावन आकर गांव की किस गली से निकल जाता है ये पता हीं नहीं चल पाता है। कहीं-कहीं बच्चे झूला झूलते जरूर नजर आते हैं, लेकिन अन्य परंपराएं अब नजर ही नहीं आती हैं।
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सावन की रिमझिम फुहारों के बीच चौपालों में आल्हा ऊदल की वीर गाथा का गायन भी किसी जमाने में होता था, लेकिन आल्हा गायकों की घटती संख्या से अब ये कम सुनने को मिलता है। नई पीढ़ी मोबाइल फोन पर ही व्यस्त होकर पुरानी परंपराएं भुला बैठी है।
कुंडौरा निवासी देवरती कुशवाहा ने कहा शादी के बाद पहले दूसरे सावन को नवविवाहिता मायके जरूर जाती थी और प्रतिदिन सहेलियों के साथ सावन मास में खुशी के क्षण बिताती थी। सावन गीत गाती थीं। पंडित दिनेश दुबे ने बताया करीब 25 साल पहले शहर से लेकर गांवों तक सावन माह के झूला झूलने की परंपराएं कायम रही।
फिल्म कलाकार ने दिखाया परंपरा से लगाव
कोरोना वायरस के कारण मायानगरी छोड़कर अपने गांव मनकीखुर्द आए फिल्म कलाकार सोमेंद्र कुमार ने सावन माह की परंपराओं को लेकर मंगलवार को बच्चों के आमोद प्रमोद के लिए झूला डाला है। उन्होंने सामाजिक दूरी का ख्याल रखते हुए बच्चों को बारी-बारी से झूला झुलाया। बच्चे भी दो गज की दूरी पर बैठकर अपनी बारी का इंतजार करते रहे। उन्होंने बताया जब तक कोरोना संक्रमण मुंबई में है, तब तक गांव में रुकना मजबूरी है।
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