‘सुख का होता आगमन, दु:ख का होता अंत। परिवर्तन का पर्व है, यह ऋतुराज
वसंत’ वसंत पंचमी नवीनता व परिवर्तन के साथ जीवन में संपन्नता, सुख,
समृद्धि का सूचक है। यह मां सरस्वती का जन्मदिन भी है। वसंत के आते ही
वृक्षों से पुराने पत्तों का झड़ना, नई कोपलों का आना, दु:ख के बाद सुख आने
का परिचायक है। पतझड़ संकेत करता है कि जीवन में कष्टो का सामना करना
पड़ता है। इसलिए घबराएं नहीं और वसंत के आने का इंतजार करें।
ऋतुओं में
वसंत ऋतु सर्वश्रेष्ठ मानी गई है। इसे ऋ तुओं का राजा भी कहते है। क्योंकि
मन को प्रफुल्लित करने वाला वातावरण अपने आप बन जाता है। खेतों में
हरियाली, सरसों के पीले फूल, आम की बौरे चारो ओर सुख समृद्धि का संदेश देती
है। आम की बौर मानव जीवन में संदेश देती है कि मनुष्य बौराए, लेकिन आम के
वृक्ष की तरह।
अर्थात दूसरो के हित के लिए न कि बौरा हो जाए। इस दिन विद्या
व ज्ञान की देवी मां सरस्वती व लेखनी की पूजा करने के साथ सभी के जीवन में
सुख शांति की कामना करनी चाहिए। ज्योतिषाचार्य पं.दिनेश दुबे ने बताया कि
मां सरस्वती का दूसरा नाम वागीश्वरी भी है। अत: वसंत पंचमी को हम वागीश्वरी
जयंती के रूप में भी मनाते है।
इस दिन मां सरस्वती के चित्र का दर्शन करना
विद्या और ज्ञान को बढ़ाने वाला है। इस वर्ष यह पर्व शनिवार को सुबह 10:18
बजे पूर्वाभाद्र पद नक्षत्र में पड़ रहा है। यह शुभ योग है।
ज्योतिषाचार्य
ने बताया कि इसदिन प्रात:काल सूर्योदय के साथ ही स्नानकर श्वेत या पीले
वस्त्र पहनकर मां सरस्वती के चित्र को स्नान कराकर श्वेत या पीला पुष्प
अर्पित कर धूप, दीप, सुंगधित द्रव्यों से पूजन करें। साथ में ‘या देवि
सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिा, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नम:’
मंत्र का 108 बार जाप करें।