ईश्वरी की फाग गायन के बिना होली त्योहार अधूरा है। काम की व्यस्तता के बीच होलिका दहन के निर्धारित स्थान पर वसंत पंचमी के दिन लकड़ी रखते ही फाग गायन की धूम हर गांव गली में मचने लगती है। सांझ ढलते ही चौपालों में फगुवारे इकट्ठा हो जाते है। दिन भर की थकान के बावजूद चौपालों में ईश्वरी फ ाग की धूम शुरू हो जाती है। पेश है कुछ फाग गायकों से बातचीत पर आधारित रिपोर्ट -
आपसी वैमनस्यता हावी
होली त्योहार की शुरुआत होते ही जल्ला गांव के कालका मंदिर में फाग गायनजारी है। गांव के रामकरन मास्टर (65) ने इस बीच आज के बदले माहौल पर दु:ख जताया। कहते है पुरानी परंपरा को अभी भी जिंदा रखे हैं। लेकिन आपसी वैमनस्यता हावी होने पर अब लोग फगुवारों की टोली में कम दिखाई देते है। फिर भी ईश्वरी की फागों का लगाव अभी खींच रहा है। देवीजी के स्थान पर रामायण, महाभारत व गीता के धार्मिक ऐतिहासिक चरित्र चित्रण पर लिखी ईश्वरी की फागों को लगाकर भाव विभोर हो जाते है। उन्होंने फाग की पंक्ति सुनाई, गाया कि बिन कामकाज महराज लाज गई मोरी, दु:ख हरो द्वारिकानाथ शरण में तोरी।
मंजीरा के साथ गाते फाग
जल्ला निवासी बासुदेव (40) मंदिर परिसर पर होली गायन के बीच मंजीरा बजाते मिले। उन्होंने फाग में रामायण की व्याख्या पर फाग गाकर बताया कि वन का निकल गए दोऊ भाई, वन का निकल गए दोऊ भाई। आगे आगे राम चलत है पीछे लक्ष्मण भाई, किन्हें बिना मोरी सूनी अयोध्या किन्हें बिना अंगनाई। कहते है कि गांव में पंचमी के बाद होली का तो माहौल बन जाता है परंतु नौजवानों में फाग गायकी की रुचि कम ले रहे है। जिससे परंपरागत तरीके से तो मनाई जाती है, लेकिन फाग गायकी में कमी आती जा रही है।
फाग गायकी से बेहद लगाव
गांव के 62 वर्षीय सिद्धा प्रजापति कहते है कि वह 20 वर्ष की उम्र से फाग गाते आ रहे है। गायकी का शौक इतना चढ़ चुका है कि कहीं भी फाग हो बिना गाये नहीं रहा जाता। कहते है हर होली त्योहार पर फगुवारे उन्हें बुलाते है। कहा कि फाग गायकी में ज्यादातर लोग रुचि रखते है। लेकिन उनका प्रयास होता है कि युवकों को इसके लिए प्रेरित करें। उन्होंने कहा कि नशेबाजों के शामिल होने से माहौल बदरंग हो जाता है। हारमोनियम, ढोलक में रंगों के भरी बाल्टी फेंकने से यंत्र खराब हो जाते हैं। गांव में घूमना तो बंद कर दिया है लेकिन कुछ लोग अपनी चौपालों पर आयोजन कराते है वहां होरियारों को रंग गुलाल से फगुवारों का तिलक करने के साथ गुझिया पकवान खिलाकर स्वागत करते है।
दादा से सीखा फाग का हुनर
जल्ला गांव में चल रही फाग गायन में शामिल होने आए पारा निवासी सुखदेव (50) कहते हैं कि उन्हें फाग गायन से बेहद लगाव है। उनके दादा फाग गाते थे। उन्हीं से यह हुनर उसने सीखा है। कहा कि चौपाल में फाग गाने से पहले भांग मिली ठंडाई और चूरा खिलाया जाता है। जिसकी चौपाल पर फाग का आयोजन होता है। वहां विशेष प्रकार के व्यजंन लोग खिलाते है। लेकिन इधर कहीं कहीं ही ठंडाई पिलाई जा रही है। अब तो जमाना बदला और लोग त्योहार पर शराब पीनी शुरू कर दी गई। लड़ाई झगड़ा करने की प्रवृत्ति त्योहार का मजा फीका करने लगी है।