हमीरपुर। द्वापर युग में श्रीकृष्ण भगवान को पाने के लिए गोपिकाएं कार्तिक मास में यमुना स्नान करने के साथ तुलसी की पूजा करती थीं। उसी परंपरा को आज भी कुंवारी कन्याएं निभा रही हैं। लेकिन नदी, पोखर व तालाबों के अभाव में अब कन्याएं हैंडपंपों में भी स्नानकर पूजा अर्चना करते दिखती हैं।
कहा जाता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण का संग पाने के लिए गोपिकाएं कार्तिक मास में तुलसी की पूजा करती थी। इसी को लेकर आज भी कुंवारी कन्याएं मन वांछित फल पाने एवं वर पाने के लिए सुबह सबेरे स्नान कर तुलसी पूजा कर इस परंपरा को निभा रही है। लेकिन मौजूदा समय में यह परंपरा ग्रामीण क्षेत्रों तक ही सीमित रह गई है। शहरी क्षेत्रों में ऐसी परंपराओं को लोगों द्वारा तवज्जों नहीं दी जाती। देखा जाए तो धनवंतरि पक्ष के अनुसार तुलसी का पौधा आयुर्वेदिक है और इस पौधे की जड़, पत्ती और तना सभी प्रतिरोधी क्षमता रखते हैं, जो शरीर के कई विकारों को दूर कर देती है। इसी तरह एक कहावत और प्रचलित है कि जालंधर की पत्नी वृंदा पतिव्रता नारी थी। लेकिन भगवान विष्णु ने उससे छल किया तो उसने श्राप दे दिया कि उनके सिर पर उसका निवास होगा। इसी के चलते आज भी पूजन आदि में तुलसी की पत्ती मंदिरों में स्थापित मूर्तियों के सिर पर चढ़ाई जा रही है।
देवोत्थान एकादशी पर धनधान्य और संपन्नता मांगी
हमीरपुर/राठ। कार्तिक माह की एकादशी को मनाया जाने वाला देवोत्थान पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया गया। लोगों ने अपने घरों में भगवान विष्णु और नई फसलों की पूजा कर धन धान्य और संपन्नता की कामना की। आस्थावानों ने शाम को अपने घरों में गन्ना, चने की भाजी, बेर, कचरिया, ज्वार की भी पूजा की। मुख्यालय के साथ ही राठ कसबा और ग्रामीण क्षेत्रों में देवोत्थान एकादशी के त्योहार पर शाम ढलते ही घर घर पूजन शुरू हो गया। ऐसी मान्यता है कि आज से देवी देवता विचरण करने लगते हैं। देव उठने के बाद विवाह आदि शुभ कार्य भी शुरू हो जाते हैं। अच्छी फसल की कामना के उद्देश्य का भी इस पूजन में महत्व है। यहां तक कहा जाता है कि इस दिन किसी भी सामाजिक कार्य करने के लिए विचार नहीं किया जाता। क्योंकि यह दिन बहुत ही शुभ माना गया है। इसके साथ ही किसान अपने गन्ने के खेत की बरही को भी खोलते है और आज से इन गन्नों को काटकर बेचने आदि का कार्य शुरू करते हैं। इसी तरह चने का साग, बेर आदि का भी प्रयोग इसी एकादशी के बाद शुरू होता है।